RPSC EO/RO · राजस्थान के दुर्ग · PA1.T11
दुर्ग · मेवाड़ का हृदय · गढ़ों का सिरमौर
भारत का क्षेत्रफल की दृष्टि से सबसे बड़ा दुर्ग, आठ शताब्दियों तक मेवाड़ की राजधानी, और तीन जौहर व तीन साकों का साक्षी।
उद्भव
चित्तौड़गढ़ राजस्थान का सर्वाधिक विशाल एवं ऐतिहासिक दृष्टि से गौरवशाली दुर्ग है, जिसे 'राजस्थान के दुर्गों का सिरमौर', 'दुर्गों का तीर्थराज' तथा 'गढ़ों का गढ़' कहा जाता है। इसकी परिकल्पना एक 'गिरि दुर्ग' (पहाड़ी दुर्ग) के रूप में की जाती है, क्योंकि यह मेसा नामक पठार/पहाड़ी पर स्थित है। दुर्ग का उद्भव अत्यंत प्राचीन है और इसका श्रेय परंपरागत रूप से मौर्य (मोरी) वंश के शासक चित्रांगद मोरी को दिया जाता है। मान्यता है कि चित्रांगद मोरी ने इस दुर्ग का निर्माण करवाया और अपने नाम पर इसे 'चित्रकूट' कहा, जो कालांतर में अपभ्रंश होकर 'चित्तौड़' बन गया। इस प्रकार दुर्ग के नामकरण की जड़ें मोरी शासक के व्यक्तिवाचक नाम में निहित हैं।

नाम की व्युत्पत्ति के संबंध में विद्वानों में मतभेद है, किंतु सर्वाधिक प्रचलित एवं परीक्षा-दृष्टि से स्वीकृत मत यही है कि 'चित्रांगद मोरी' → 'चित्रकूट' → 'चित्तौड़' के क्रम में नाम विकसित हुआ। यहाँ 'गढ़' शब्द दुर्ग/किले का द्योतक है, अतः चित्तौड़ का दुर्ग 'चित्तौड़गढ़' कहलाया। प्रारंभिक काल में यह क्षेत्र मोरी (मौर्य) शासकों के अधीन रहा, जो स्थानीय शक्तिशाली राजवंश थे। ध्यातव्य है कि ये 'मोरी' मगध के मौर्य साम्राज्य (चंद्रगुप्त मौर्य) से भिन्न, राजस्थान का स्थानीय मौर्य/मोरी राजवंश माने जाते हैं।
दुर्ग के प्राचीन इतिहास में जल-संरचनाओं तथा पौराणिक अनुश्रुतियों का विशेष स्थान है। दुर्ग परिसर के भीतर स्थित 'भीमलत' (भीम-कुंड) से महाभारतकालीन पांडव भीम की जनश्रुति जुड़ी है — कहा जाता है कि भीम ने एक ही प्रहार/लात से यहाँ जल-स्रोत उत्पन्न किया, इसी कारण इसे 'भीमलत' कहा गया। इसी प्रकार दुर्ग के भीतर अनेक कुंड, तालाब एवं जलाशय हैं, जिनमें मानसरोवर (मानसरोवर झील), गौमुख कुंड आदि प्रमुख हैं; ये जल-स्रोत दुर्ग को लंबे घेरे (अवरोध) में भी आत्मनिर्भर बनाते थे और इसकी सामरिक शक्ति के मूल आधार थे।
मोरी शासन के पश्चात दुर्ग गुहिल (गहलोत/सिसोदिया) वंश के अधिकार में आया। परंपरा के अनुसार लगभग 734 ई. (कुछ स्रोतों में 728 ई.) में मेवाड़ के गुहिल वंश के प्रवर्तक बप्पा रावल (कालभोज) ने मोरी शासक (जनश्रुति में मानमोरी/मनुराज (मान मोरी)) से यह दुर्ग प्राप्त किया। इसी घटना के साथ चित्तौड़ मेवाड़ की राजधानी एवं गुहिल-सिसोदिया शक्ति का केंद्र बना और लगभग आठवीं शताब्दी से सोलहवीं शताब्दी तक मेवाड़ का प्रमुख केंद्र रहा (यद्यपि प्रारंभिक गुहिल शासक नागदा-आहड़ से शासन करते थे; चित्तौड़ का प्रमुख राजधानी-रूप में उभार 14वीं सदी के बाद सुदृढ़ हुआ, और 1568 में अकबर के अधिकार से पूर्व ही उदयसिंह ने राजधानी उदयपुर की ओर स्थानांतरित करनी आरंभ कर दी थी)। बप्पा रावल द्वारा दुर्ग प्राप्ति की यह तिथि (परंपरागत 734 ई.; कुछ स्रोतों में 728 ई.) परीक्षा में महत्वपूर्ण है।
भौगोलिक दृष्टि से चित्तौड़गढ़ दुर्ग बेड़च (बेराच) एवं गंभीरी नदियों के संगम-क्षेत्र के निकट, मेसा पठार पर स्थित है। दुर्ग एक विशाल, मछली/व्हेल के आकार जैसी लंबी पहाड़ी पर फैला है। इसकी लंबाई लगभग 5 किमी तथा यह सैकड़ों एकड़ (लगभग 700 एकड़/280 हेक्टेयर के आसपास) क्षेत्र में विस्तृत है। पहाड़ी आसपास के मैदान से लगभग 180 मीटर (लगभग 500-600 फुट) ऊँची उठी है, जिससे दुर्ग को प्राकृतिक सुरक्षा प्राप्त होती है। बेड़च व गंभीरी नदियाँ दुर्ग के प्राकृतिक जल-अवरोध व जल-आपूर्ति का कार्य करती थीं, और यही भूगोल इसे अभेद्य दुर्गों में गिनवाता है।
| तथ्य | विवरण |
|---|---|
| मूल नाम | चित्रकूट (चित्रांगद मोरी के नाम पर) |
| व्युत्पत्ति-क्रम | चित्रांगद मोरी → चित्रकूट → चित्तौड़ → चित्तौड़गढ़ |
| निर्माता (परंपरा) | चित्रांगद मोरी (मौर्य/मोरी वंश) |
| 'गढ़' का अर्थ | दुर्ग/किला |
| उपनाम | दुर्गों का सिरमौर, दुर्गों का तीर्थराज, गढ़ों का गढ़ |
| दुर्ग वर्ग | गिरि दुर्ग (पहाड़ी दुर्ग) |
| काल/तिथि | घटना |
|---|---|
| प्राचीन काल | मोरी (मौर्य) वंश का शासन; चित्रांगद मोरी द्वारा दुर्ग-निर्माण |
| लगभग 734 ई. | बप्पा रावल (कालभोज) द्वारा मोरी शासक से दुर्ग की प्राप्ति |
| परिणाम | चित्तौड़ मेवाड़ की राजधानी व गुहिल-सिसोदिया शक्ति का केंद्र बना |
| अंतिम मोरी शासक (जनश्रुति) | मानमोरी / मनुराज (मान मोरी) |
| 1568 ई. | अकबर द्वारा चित्तौड़ पर अधिकार (राजधानी उदयपुर स्थानांतरित) |
| तथ्य | विवरण |
|---|---|
| स्थिति | मेसा पठार/पहाड़ी पर, चित्तौड़गढ़ (राजस्थान) |
| प्रमुख नदियाँ | बेड़च (बेराच) एवं गंभीरी |
| पहाड़ी की ऊँचाई | आसपास के मैदान से लगभग 180 मीटर |
| दुर्ग की लंबाई | लगभग 5 किमी |
| क्षेत्रफल (लगभग) | लगभग 700 एकड़ / ~280 हेक्टेयर |
| आकृति | लंबी, मछली/व्हेल-सदृश पहाड़ी |
| प्रमुख जलाशय | मानसरोवर, गौमुख कुंड, भीमलत कुंड |
कालक्रम
चित्तौड़गढ़ मेवाड़ के गुहिल-सिसोदिया राजवंश की राजनीतिक और भावनात्मक राजधानी रहा है। परंपरा के अनुसार दुर्ग का मूल निर्माण मौर्य (मोरी) शासक चित्रांग (चित्रांगद मोरी) से जोड़ा जाता है, जिसके नाम पर 'चित्रकूट' या चित्तौड़ नाम पड़ा। लगभग 8वीं शताब्दी में बप्पा रावल ने मोरी शासक 'मान मोरी' से यह दुर्ग प्राप्त कर गुहिल वंश की स्थापना की — यहीं से मेवाड़ का सुदीर्घ शासक-कालक्रम आरम्भ होता है, जो लगभग आठ शताब्दियों तक चित्तौड़ को केंद्र बनाकर चला।
चित्तौड़ के इतिहास की धुरी उसके तीन साके (शाका) और तीन जौहर हैं। प्रथम साका 1303 ई. में अलाउद्दीन खलजी के आक्रमण के समय (रानी पद्मिनी से संबद्ध), द्वितीय साका 1535 ई. में गुजरात के बहादुरशाह के आक्रमण के समय (रानी कर्णावती से संबद्ध), और तृतीय साका 1568 ई. में अकबर के आक्रमण के समय (जयमल-पत्ता की वीरता से संबद्ध) घटित हुआ। इन तीनों के बीच के शासक — विशेषकर हम्मीर, कुम्भा, सांगा और उदयसिंह — मेवाड़ के उत्थान और पुनरुत्थान के प्रतीक हैं।
1303 में चित्तौड़ खोने के बाद रावल शाखा का पतन हुआ और सिसोदिया शाखा का उदय हुआ। राणा हम्मीर सिंह ने लगभग 1326 ई. में चित्तौड़ पुनः प्राप्त कर सिसोदिया वंश की नींव रखी; इसी वंश ने आगे राणा कुम्भा और राणा सांगा के काल में मेवाड़ को उत्तर भारत की सर्वप्रमुख राजपूत शक्ति बना दिया। राणा कुम्भा ने माळवा के महमूद खलजी पर विजय (1440) के उपलक्ष्य में विश्वप्रसिद्ध विजय स्तंभ का निर्माण करवाया, तो राणा सांगा ने खातोली, बाड़ी और अंततः 1527 की खानवा में बाबर से युद्ध कर मेवाड़ की प्रतिष्ठा को शिखर पर पहुँचाया।
सांगा की मृत्यु (1528) के बाद मेवाड़ में उत्तराधिकार-संघर्ष तीव्र हुआ। विक्रमादित्य के दुर्बल शासन में 1535 का द्वितीय जौहर हुआ; फिर सिंहासन-लोलुप बनवीर ने विक्रमादित्य की हत्या कर दी और शिशु उदयसिंह को मारना चाहा, किन्तु स्वामिभक्त धाय पन्ना धाय ने अपने पुत्र चंदन का बलिदान देकर उदयसिंह की रक्षा की। 1540 में उदयसिंह द्वितीय ने बनवीर को पराजित कर मेवाड़ का सिंहासन पुनः प्राप्त किया, 1559 में उदयपुर की स्थापना की, और उन्हीं के काल में 1567-68 में अकबर के आक्रमण एवं तृतीय जौहर के साथ चित्तौड़ का महत्त्व इतिहास में अमर हो गया।
| शासक | शासनकाल (ई.) | वंश/शाखा | चित्तौड़ से संबद्ध प्रमुख घटना |
|---|---|---|---|
| बप्पा रावल | लगभग 728-753 | गुहिल (संस्थापक) | मोरी शासक मान मोरी से चित्तौड़ प्राप्त; गुहिल वंश की स्थापना |
| जैत्रसिंह (जैत्रसी) | लगभग 1213-1252 | गुहिल (रावल शाखा) | 1226-27 में इल्तुतमिश के नागदा आक्रमण को विफल किया |
| रत्नसिंह (रतनसी) | लगभग 1302-1303 | गुहिल (रावल शाखा) | 1303 अलाउद्दीन खलजी का घेरा; प्रथम जौहर; चित्तौड़ का पतन |
| हम्मीर सिंह | लगभग 1326-1364 | सिसोदिया (संस्थापक) | मालदेव/सोनगरा से चित्तौड़ पुनः प्राप्त; सिसोदिया वंश की स्थापना |
| क्षेत्रसिंह (खेता) | लगभग 1364-1382 | सिसोदिया | मेवाड़ का विस्तार; माळवा-दिशा में सैन्य सफलता |
| राणा लाखा (लक्ष्यसिंह) | लगभग 1382-1421 | सिसोदिया | जावर की चाँदी/जस्ता खानें, गंभीरी बांध व पिछोला-कार्य |
| राणा मोकल | लगभग 1421-1433 | सिसोदिया | समाधीश्वर मंदिर का जीर्णोद्धार; अल्पायु में हत्या |
| राणा कुम्भा (कुम्भकर्ण) | 1433-1468 | सिसोदिया | 1440 महमूद खलजी पर विजय; विजय स्तंभ का निर्माण |
| उदयसिंह प्रथम (उदा) | 1468-1473 | सिसोदिया | पिता कुम्भा की हत्या कर सत्ता; वज्रपात से मृत्यु |
| राणा रायमल | 1473-1509 | सिसोदिया | मेवाड़ में पुनः स्थिरता; पुत्रों में उत्तराधिकार-संघर्ष |
| राणा सांगा (संग्रामसिंह) | 1509-1528 | सिसोदिया | खातोली, बाड़ी व 1527 खानवा; मेवाड़ का शक्ति-शिखर |
| रत्नसिंह द्वितीय | 1528-1531 | सिसोदिया | अल्प व अशांत शासन; बूँदी संघर्ष में मृत्यु |
| विक्रमादित्य | 1531-1536 | सिसोदिया | 1535 बहादुरशाह आक्रमण; द्वितीय जौहर (रानी कर्णावती) |
| बनवीर (हड़प करने वाला) | 1536-1540 | सिसोदिया (शाखा) | विक्रमादित्य की हत्या; पन्ना धाय द्वारा उदयसिंह की रक्षा |
| उदयसिंह द्वितीय | 1540-1572 | सिसोदिया | 1559 उदयपुर स्थापना; 1567-68 अकबर का घेरा व तृतीय जौहर |
| साका/जौहर | वर्ष (ई.) | आक्रमणकारी | मेवाड़ शासक | संबद्ध रानी/वीर |
|---|---|---|---|---|
| प्रथम | 1303 | अलाउद्दीन खलजी | रत्नसिंह (रावल) | रानी पद्मिनी |
| द्वितीय | 1535 | बहादुरशाह (गुजरात) | विक्रमादित्य | रानी कर्णावती (कर्मावती) |
| तृतीय | 1568 | अकबर | उदयसिंह द्वितीय | जयमल राठौड़ व पत्ता सिसोदिया; जौहर — दुर्ग की स्त्रियाँ (नायिका अपुष्ट) |
| युद्ध | वर्ष (ई.) | प्रतिपक्ष | परिणाम |
|---|---|---|---|
| खातोली का युद्ध | 1517 | इब्राहीम लोदी | सांगा विजयी |
| बाड़ी/धौलपुर का युद्ध | लगभग 1518-19 | इब्राहीम लोदी | सांगा विजयी |
| गागरोन का युद्ध | लगभग 1519 | महमूद खलजी द्वितीय (माळवा) | सांगा विजयी; महमूद बंदी |
| खानवा का युद्ध | 16 मार्च 1527 | बाबर | सांगा पराजित |
प्रथम साका
चित्तौड़गढ़ दुर्ग के इतिहास में 1303 ई. का घेरा एक निर्णायक मोड़ है, क्योंकि यह दुर्ग के तीन प्रसिद्ध साकों में प्रथम था। इस समय मेवाड़ पर गुहिल वंश की रावल शाखा के शासक रावल रतन सिंह (रत्नसिंह) का शासन था, जो 1302-03 ई. के लगभग गद्दी पर थे। दूसरी ओर दिल्ली सल्तनत का सिंहासन अलाउद्दीन खिलजी के अधीन था, जो साम्राज्यवादी विस्तार, आर्थिक-सामरिक नियंत्रण तथा राजपूताना के सुदृढ़ दुर्गों पर अधिकार की नीति चला रहा था। रणथम्भौर (1301) पर विजय के पश्चात अलाउद्दीन की दृष्टि मेवाड़ के अजेय माने जाने वाले चित्तौड़ दुर्ग पर पड़ी, जो मालवा-गुजरात मार्ग पर सामरिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण था।
इतिहास के समकालीन एवं एकमात्र प्रत्यक्षदर्शी स्रोत अमीर खुसरो हैं, जो स्वयं अलाउद्दीन के साथ इस अभियान में उपस्थित थे। उन्होंने अपनी रचना 'खजाइन-उल-फुतूह' (जिसे 'तारीख-ए-अलाई' भी कहते हैं) में इस घेरे का वर्णन किया है। खुसरो के अनुसार अभियान लगभग जनवरी 1303 में आरंभ हुआ और लंबे घेरे के पश्चात 26 अगस्त 1303 को दुर्ग विजित हुआ। खुसरो ने दुर्ग-विजय के बाद हुए भीषण नरसंहार का उल्लेख किया है, परंतु ध्यातव्य है कि खुसरो ने रानी पद्मिनी का कोई उल्लेख नहीं किया — यही परीक्षा की दृष्टि से सबसे बड़ा तथ्य है। पद्मिनी की कथा साहित्यिक-किंवदंती है, ऐतिहासिक अभिलेख नहीं।
पद्मिनी-वृत्तांत का सर्वप्रथम स्रोत मलिक मुहम्मद जायसी का 'पद्मावत' (रचनाकाल लगभग 1540 ई.) है, जो अवधी भाषा में रचित एक सूफी प्रेमाख्यानक/रूपक काव्य है। घेरे की घटना के लगभग 237 वर्ष बाद रचित यह काव्य रूपकात्मक है, जिसमें रतन सिंह को 'मन', पद्मिनी को 'बुद्धि', अलाउद्दीन को 'माया' और तोता (हीरामन) को 'गुरु' का प्रतीक बताया गया है। जायसी की कथा के अनुसार रतन सिंह के दरबार से निष्कासित ब्राह्मण राघव चेतन ने रुष्ट होकर दिल्ली जाकर अलाउद्दीन को पद्मिनी के अलौकिक सौंदर्य का वर्णन सुनाया, जिससे प्रेरित होकर अलाउद्दीन ने चित्तौड़ पर आक्रमण किया।
जायसी की किंवदंती में कूटनीति और वीरता का रोचक प्रसंग है: अलाउद्दीन ने दर्पण/जल में पद्मिनी की केवल छाया देखने की शर्त पर संधि की, फिर छल से रतन सिंह को बंदी बनाकर दिल्ली ले गया। इस पर पद्मिनी की चतुराई से गोरा और बादल नामक दो वीर राजपूत योद्धाओं ने योजना बनाई — 700 पालकियों में सैनिकों को छिपाकर, यह बहाना बनाकर कि इनमें पद्मिनी व उसकी दासियाँ आ रही हैं, वे दिल्ली पहुँचे और रतन सिंह को छुड़ा लाए। इस संघर्ष में वृद्ध गोरा वीरगति को प्राप्त हुआ, जबकि बालक बादल रतन सिंह को सुरक्षित चित्तौड़ ले आया। यहाँ गोरा को बादल का चाचा (काका) बताया गया है।
घटनाक्रम की परिणति में जब दुर्ग की रक्षा असंभव हो गई, तो राजपूत परंपरा के अनुसार साका हुआ — पुरुष योद्धाओं ने केसरिया वस्त्र धारण कर अंतिम युद्ध में प्राण न्योछावर किए, और स्त्रियों ने सम्मान-रक्षा हेतु अग्नि में प्रवेश कर जौहर किया। किंवदंती के अनुसार इस प्रथम जौहर का नेतृत्व रानी पद्मिनी ने किया। विजय के पश्चात अलाउद्दीन ने चित्तौड़ का नाम अपने पुत्र खिज्र खाँ के नाम पर 'खिज्राबाद' रखा और शासन-भार खिज्र खाँ को सौंपा। यही 1303 का प्रथम साका था, जिसने चित्तौड़ को बलिदान और आत्म-सम्मान का प्रतीक बना दिया।

| तथ्य | विवरण |
|---|---|
| वर्ष / तिथि | 1303 ई. (घेरा जन. 1303 — दुर्ग-पतन 26 अगस्त 1303) |
| आक्रमणकारी | अलाउद्दीन खिलजी (दिल्ली सल्तनत, खिलजी वंश) |
| मेवाड़ शासक | रावल रतन सिंह (रत्नसिंह) — गुहिल/रावल शाखा |
| रानी | रानी पद्मिनी (पद्मावती) — किंवदंती अनुसार |
| प्रमुख वीर | गोरा एवं बादल (चाचा-भतीजा) |
| समकालीन प्रत्यक्षदर्शी स्रोत | अमीर खुसरो — 'खजाइन-उल-फुतूह' / 'तारीख-ए-अलाई' |
| पद्मिनी-कथा का स्रोत | मलिक मुहम्मद जायसी कृत 'पद्मावत' (लगभग 1540 ई., अवधी) |
| षड्यंत्रकारी पात्र | राघव चेतन (निष्कासित ब्राह्मण) — जायसी अनुसार |
| परिणाम | साका (पुरुषों का अंतिम युद्ध) + जौहर (स्त्रियों का अग्नि-प्रवेश) |
| दुर्ग का नया नाम | खिज्राबाद (पुत्र खिज्र खाँ के नाम पर) |
| नया शासक | खिज्र खाँ (अलाउद्दीन का पुत्र) |
| पात्र | रूपक (प्रतीक) |
|---|---|
| रतन सिंह | मन |
| पद्मिनी | बुद्धि / विवेक |
| अलाउद्दीन | माया |
| हीरामन तोता | गुरु |
| राघव चेतन | शैतान / मायावी |
| साका | वर्ष | आक्रमणकारी | मेवाड़ शासक | जौहर-नेतृत्व |
|---|---|---|---|---|
| प्रथम | 1303 | अलाउद्दीन खिलजी | रावल रतन सिंह | रानी पद्मिनी (किंवदंती) |
| द्वितीय | 1535 | बहादुर शाह (गुजरात) | विक्रमादित्य (नाबालिग) | रानी कर्णावती |
| तृतीय | 1568 | अकबर | उदय सिंह (अनुपस्थित); जयमल-पत्ता रक्षक | जौहर — राजपूत स्त्रियाँ (नाम अपुष्ट) |
द्वितीय साका
चित्तौड़गढ़ दुर्ग के इतिहास में जो तीन 'साके' (सामूहिक बलिदान — पुरुषों का केसरिया और स्त्रियों का जौहर) प्रसिद्ध हैं, उनमें द्वितीय साका 1535 ई. में गुजरात के सुल्तान बहादुर शाह के आक्रमण के समय हुआ। यह घटना राणा सांगा (महाराणा संग्राम सिंह) की मृत्यु (1528, खानवा के बाद 1528 ई. में) के कुछ ही वर्षों बाद घटी, जब मेवाड़ नेतृत्व-शून्यता और आंतरिक फूट से जूझ रहा था। इस समय मेवाड़ का शासक सांगा का पुत्र विक्रमादित्य (विक्रमादित्य सिंह) था, जो अल्पवयस्क, उद्दंड और सरदारों में अलोकप्रिय था; उसके अशिष्ट व्यवहार से मेवाड़ के अनेक प्रमुख सामंत रुष्ट होकर अलग हो गए थे। इस राजनीतिक दुर्बलता ने ही बहादुर शाह को चित्तौड़ पर आक्रमण का अवसर दिया।
वास्तव में बहादुर शाह ने दो बार आक्रमण किया। पहला आक्रमण 1532-33 ई. में हुआ (घेरा दिसंबर 1532 में आरंभ, मार्च 1533 में संधि), जिसे राणा सांगा की विधवा एवं विक्रमादित्य की माता रानी कर्णावती (कर्मावती) ने कूटनीति से टाल दिया — कहा जाता है कि उसने संधि कर धन/क्षेत्र देकर सुल्तान को लौटा दिया। किंतु 1535 ई. में बहादुर शाह पुनः विशाल सेना और सुसज्जित तोपखाने के साथ लौटा। इस दूसरे घेरे में निर्णायक भूमिका उसके तोपखाने की रही, जिसका प्रमुख रूमी खान नामक एक तुर्क (उस्मानी/रूमी) गोलंदाज़ था। रूमी खान ने दुर्ग की प्राचीरों के नीचे बारूदी सुरंगें (नकब) लगाकर बुर्जों को उड़ा दिया — इसी एक विस्फोट में सैकड़ों रक्षक मारे गए। यह भारतीय इतिहास में बारूद व तोपखाने की बढ़ती निर्णायक शक्ति का उदाहरण माना जाता है, जहाँ चित्तौड़ जैसा अभेद्य दुर्ग भी आधुनिक गोलंदाज़ी के आगे टिक न सका।
जब पराजय निश्चित हो गई, तब मेवाड़ की परंपरा के अनुसार दुर्ग में जौहर और साका हुआ। रानी कर्णावती के नेतृत्व में लगभग 13,000 वीरांगनाओं ने अग्निकुंड में प्रवेश कर जौहर किया (यह संख्या परंपरागत/अनुमानित है)। इसके पश्चात केसरिया वस्त्र धारण कर राजपूत योद्धा दुर्ग-द्वार खोलकर शत्रु पर टूट पड़े और वीरगति को प्राप्त हुए। इस साके की एक विशेष बात यह रही कि रानी कर्णावती ने भविष्य की रक्षा हेतु दोनों राजकुमारों — विक्रमादित्य और उदयसिंह (जो आगे चलकर महाराणा प्रताप के पिता बने) — को घेरे से पूर्व बूँदी भेज दिया, ताकि मेवाड़ का वंश और गद्दी सुरक्षित रहे।
इस साके से जुड़ी सर्वाधिक प्रसिद्ध किंवदंती 'राखी की कथा' है। परंपरा के अनुसार, संकट के समय रानी कर्णावती ने मुगल सम्राट हुमायूँ को राखी भेजकर भाई मानते हुए सहायता माँगी। कहा जाता है कि हुमायूँ ने राखी का सम्मान करते हुए मेवाड़ की ओर कूच किया, किंतु वह तब पहुँचा जब चित्तौड़ में जौहर हो चुका था; अतः उसने बहादुर शाह का पीछा कर उसे मांडू/गुजरात की ओर खदेड़ा और बाद में विक्रमादित्य को मेवाड़ का शासन लौटाया। यह कथा कर्नल जेम्स टॉड ने लोकप्रिय की; अनेक आधुनिक इतिहासकार इसकी ऐतिहासिकता (विशेषतः राखी भेजने के तथ्य) को संदिग्ध मानते हैं, फिर भी यह राजस्थान की सांस्कृतिक स्मृति और परीक्षाओं में स्थायी रूप से जुड़ी है।
रक्षा-पक्ष की दृष्टि से इस साके में हाड़ा राजपूतों की भूमिका उल्लेखनीय रही। रानी कर्णावती स्वयं बूँदी के हाड़ा राजवंश की राजकुमारी (बूँदी के राव नरबद की पुत्री मानी जाती है) थीं, अतः उनके ननिहाल-पक्ष के हाड़ा सरदार उनकी सहायता को आए। स्रोतों में देवला के बाघ सिंह (सिसोदिया) सरदार का इस साके में वीरगति पाने का उल्लेख मिलता है ('देवला के बाघ सिंह' का प्रचलित उल्लेख भ्रामक है)। समग्रतः द्वितीय साका न केवल बलिदान की गाथा है, बल्कि यह मेवाड़ की आंतरिक फूट, तोपखाने-आधारित युद्ध की नई निर्णायकता और राजपूत-मुगल संबंधों के प्रारंभिक स्वरूप को समझने की दृष्टि से RAS/EO-RO स्तर पर अत्यंत महत्वपूर्ण है।
| तथ्य | विवरण |
|---|---|
| वर्ष | 1535 ई. (जौहर सामान्यतः 8 मार्च 1535 को माना जाता है) |
| क्रम | चित्तौड़ का द्वितीय साका |
| आक्रमणकारी | गुजरात का सुल्तान बहादुर शाह |
| मेवाड़ शासक | विक्रमादित्य (राणा सांगा का पुत्र, अल्पवयस्क/अलोकप्रिय) |
| रक्षा नेतृत्व | रानी कर्णावती (कर्मावती), सांगा की विधवा |
| जौहर | रानी कर्णावती सहित लगभग 13,000 वीरांगनाएँ |
| तोपखाना प्रमुख | रूमी खान — तुर्क/रूमी गोलंदाज़; बारूदी सुरंगों से बुर्ज उड़ाए |
| प्रसिद्ध कथा | रानी कर्णावती द्वारा हुमायूँ को राखी भेजना (परंपरा) |
| राजकुमारों की रक्षा | विक्रमादित्य व उदयसिंह घेरे से पूर्व बूँदी भेजे गए |
| हाड़ा योगदान | देवला के बाघ सिंह (सिसोदिया) का बलिदान |
| पात्र | भूमिका/महत्व |
|---|---|
| बहादुर शाह | गुजरात सुल्तान; 1532-33 व 1535 में चित्तौड़ पर आक्रमण; बाद में हुमायूँ से पराजित |
| रानी कर्णावती | राणा सांगा की रानी; दुर्ग-रक्षा का नेतृत्व; जौहर की अगुवा |
| विक्रमादित्य | तत्कालीन मेवाड़ शासक; बूँदी भेजा गया; बाद में गद्दी लौटाई गई |
| उदयसिंह | सांगा का छोटा पुत्र; सुरक्षार्थ बूँदी भेजा गया; आगे उदयपुर-संस्थापक व प्रताप के पिता |
| रूमी खान | बहादुर शाह का गोलंदाज़; तोपखाने/सुरंगों से दुर्ग-भंग; बाद में हुमायूँ की सेवा में गया |
| हुमायूँ | मुगल सम्राट; राखी-कथा से जुड़ा; बहादुर शाह को खदेड़ा |
| देवला के बाघ सिंह | रक्षक सरदार; साके में वीरगति |
| साका | वर्ष | आक्रमणकारी | मेवाड़ शासक | जौहर नेतृत्व |
|---|---|---|---|---|
| प्रथम | 1303 ई. | अलाउद्दीन खिलजी | रावल रतनसिंह | रानी पद्मिनी |
| द्वितीय | 1535 ई. | बहादुर शाह (गुजरात) | विक्रमादित्य | रानी कर्णावती |
| तृतीय | 1568 ई. | अकबर | उदयसिंह (नेतृत्व जयमल-पत्ता) | जौहर — दुर्ग की स्त्रियाँ (नाम अपुष्ट) |
तृतीय साका
चित्तौड़गढ़ के इतिहास में सन् 1567-68 का घेरा 'तृतीय साका' के रूप में स्मरण किया जाता है और यह तीनों साकों में सर्वाधिक व्यापक तथा रक्तरंजित माना जाता है। इस समय मेवाड़ के शासक महाराणा उदयसिंह द्वितीय (राणा साँगा के पुत्र) थे। सन् 1567 में मुग़ल सम्राट अकबर ने चित्तौड़ पर आक्रमण किया। इसके पीछे राजनीतिक कारण थे — अकबर मेवाड़ की स्वतंत्र सत्ता को कुचलकर राजपूताना के मध्य में अपनी धाक जमाना चाहता था, चित्तौड़ का सामरिक-प्रतीकात्मक महत्व तोड़ना चाहता था, और उदयसिंह द्वारा अकबर के विरोधियों (जैसे बाज़ बहादुर तथा माळवा के शरणार्थियों) को संरक्षण देने से भी वह क्रुद्ध था। परंपरागत मान्यता के अनुसार अकबर ने अक्टूबर 1567 (लगभग 20-23 अक्टूबर) में दुर्ग को घेरा और यह घेरा लगभग चार माह चला।
घेरे से पूर्व ही महाराणा उदयसिंह ने सामंतों की सलाह पर दुर्ग की रक्षा का भार अपने दो वीर सेनानायकों — जयमल राठौड़ (मेड़ता) तथा पत्ता (फत्ता) सिसोदिया (कैलवा/केलवा) — को सौंपकर स्वयं पहाड़ियों की ओर चले गए। उदयसिंह का दुर्ग छोड़ जाना बाद में विवाद और आलोचना का विषय बना, परंतु राजनीतिक दृष्टि से इसने मेवाड़ के शासक-वंश और भावी नेतृत्व (महाराणा प्रताप) को सुरक्षित रखा। अकबर ने दुर्ग की मोटी दीवारों को भेदने के लिए 'साबात' (ढकी हुई सुरंग-नुमा अग्रगामी खाई) बनवाई तथा भारी तोपों व बारूदी सुरंगों का प्रयोग किया। घेरे के दौरान जयमल राठौड़ रात्रि में दीवार की मरम्मत का निरीक्षण कर रहे थे, तभी अकबर ने अपनी प्रसिद्ध बंदूक 'संग्राम' से चलाई गई गोली से उन्हें घायल/मृत कर दिया (22-23 फरवरी 1568 की रात)।
जयमल के आहत होने पर रक्षा का नेतृत्व मात्र सोलह वर्षीय पत्ता (फत्ता) सिसोदिया ने सँभाला। परंपरा के अनुसार पत्ता की माता ने उसे कवच पहनाकर, स्वयं तथा पत्ता की नवविवाहिता पत्नी को शस्त्र देकर रणभूमि में उतारा। जब पुरुषों ने 'केसरिया' (साका) धारण कर अंतिम युद्ध का निश्चय किया, तब दुर्ग की स्त्रियों ने जौहर किया (अकबरनामा के अनुसार 22 फरवरी 1568 की रात दुर्ग के विभिन्न घरों में अनेक राजपूत स्त्रियों ने जौहर किया — इनमें पत्ता की माता का उल्लेख मिलता है। प्रचलित 'रानी फूल कँवर' नाम समकालीन स्रोतों में नहीं मिलता, और चूँकि शासक उदयसिंह दुर्ग छोड़ चुके थे, कोई 'चित्तौड़ की रानी' इसकी नायिका नहीं थी) — यह चित्तौड़ का तृतीय (और अंतिम) जौहर था। 23 फरवरी 1568 को चित्तौड़ पतित हुआ। विजय के पश्चात अकबर ने प्रतिशोध में लगभग 30,000 निवासियों का संहार करवाया (अबुल फ़ज़ल के 'अकबरनामा' के अनुसार)। किंतु जयमल और पत्ता की वीरता से अकबर इतना प्रभावित हुआ कि उसने आगरा दुर्ग के द्वार पर दोनों वीरों की हाथी पर आरूढ़ पाषाण-प्रतिमाएँ स्थापित करवाईं — यह पराजित शत्रु के शौर्य को दिया गया अद्वितीय सम्मान था।
तृतीय साका को पूर्ण रूप से समझने हेतु उदयसिंह के बाल्यकाल का 'पन्ना धाय प्रसंग' अनिवार्य पृष्ठभूमि है। राणा साँगा की मृत्यु के बाद मेवाड़ में सत्ता-संघर्ष चला। साँगा के भाई पृथ्वीराज के अवैध पुत्र बनवीर ने सन् 1536 के आसपास साँगा के पुत्र विक्रमादित्य की हत्या कर सत्ता हथिया ली और शिशु उदयसिंह को भी मार डालना चाहा। उदयसिंह की धाय (दाई) पन्ना धाय ने अपने ही पुत्र चंदन को राजकुमार की शय्या पर सुला दिया; बनवीर ने उसे ही उदयसिंह समझकर मार डाला। पन्ना धाय ने उदयसिंह को थाली/टोकरी में छिपाकर दुर्ग से बाहर निकाला और कुम्भलगढ़ के कोटवाल आशा शाह (आशा देपुरा) के संरक्षण में पहुँचाया। पुत्र-बलिदान की यह गाथा राजपूत स्वामिभक्ति का उच्चतम उदाहरण मानी जाती है। कालांतर में सन् 1540 में उदयसिंह ने बनवीर को पराजित कर मेवाड़ का सिंहासन पुनः प्राप्त किया।
चित्तौड़ की भौगोलिक असुरक्षा तथा भावी मुग़ल आक्रमणों को ध्यान में रखते हुए उदयसिंह ने पिछोला झील के निकट अरावली की सुरक्षित घाटी में एक नई राजधानी बसाई — उदयपुर। प्रचलित मान्यता के अनुसार 1559 ई. में उदयपुर नगर की नींव रखी गई (उदयसागर झील का निर्माण भी इसी काल 1559-1565 में हुआ); कहा जाता है कि एक साधु/तपस्वी के आशीर्वाद व परामर्श पर उदयसिंह ने यह स्थल चुना। 1568 में चित्तौड़ के पतन के बाद उदयपुर व्यावहारिक रूप से मेवाड़ की राजधानी बन गया। इस प्रकार चित्तौड़ का तृतीय साका एक युग का अंत और उदयपुर-केन्द्रित मेवाड़ के नए संघर्ष-युग (जो आगे हल्दीघाटी 1576 तक पहुँचा) का आरंभ था।

| तथ्य | विवरण |
|---|---|
| शासक (मेवाड़) | महाराणा उदयसिंह द्वितीय (राणा साँगा के पुत्र) |
| आक्रमणकारी | मुग़ल सम्राट अकबर |
| घेरा आरंभ | अक्टूबर 1567 (लगभग 20-23 अक्टूबर) |
| घेरे की अवधि | लगभग 4 माह |
| दुर्ग का पतन | 23 फरवरी 1568 |
| रक्षा का नेतृत्व | जयमल राठौड़ (मेड़ता) व पत्ता/फत्ता सिसोदिया (कैलवा) |
| जौहर | 22 फरवरी 1568 की रात दुर्ग की अनेक राजपूत स्त्रियाँ (विभिन्न घरों में); कोई एकल नामित नायिका स्रोत-सम्मत नहीं |
| अकबर की तकनीक | साबात (ढकी खाई), बारूदी सुरंगें, भारी तोपें, 'संग्राम' बंदूक |
| जयमल की मृत्यु | अकबर की बंदूक 'संग्राम' की गोली से (22-23 फरवरी की रात) |
| पतन के बाद संहार | लगभग 30,000 निवासियों की हत्या (अकबरनामा) |
| अकबर का सम्मान | आगरा दुर्ग द्वार पर जयमल-पत्ता की हाथी-आरूढ़ पाषाण प्रतिमाएँ |
| परिणाम | उदयपुर मेवाड़ की व्यावहारिक राजधानी बना |
| पात्र | परिचय | भूमिका / अंत |
|---|---|---|
| उदयसिंह द्वितीय | मेवाड़ शासक, प्रताप के पिता | सामंतों की सलाह पर दुर्ग छोड़ा; वंश व नेतृत्व सुरक्षित रखा |
| जयमल राठौड़ | मेड़ता का राठौड़ वीर (वीरमदेव का पुत्र) | मुख्य सेनानायक; अकबर की गोली से मारे गए |
| पत्ता (फत्ता) सिसोदिया | कैलवा का सिसोदिया, आयु ~16 वर्ष | जयमल के बाद नेतृत्व; युद्ध में वीरगति |
| पत्ता की माता | सिसोदिया वीरांगना | पत्ता को कवच पहनाया, स्वयं व पुत्रवधू को शस्त्र देकर लड़ीं |
| जौहर करने वाली स्त्रियाँ | दुर्ग की अनेक राजपूत वीरांगनाएँ | 22 फरवरी 1568 की रात विभिन्न घरों में जौहर; कोई एकल नामित 'रानी' स्रोत-सम्मत नहीं |
| अबुल फ़ज़ल | अकबर का दरबारी इतिहासकार | 'अकबरनामा' में घेरे व संहार का वर्णन |
| साका | वर्ष | आक्रमणकारी | जौहर-नायिका |
|---|---|---|---|
| प्रथम साका | 1303 ई. | अलाउद्दीन खिलजी | रानी पद्मिनी (पद्मावती) |
| द्वितीय साका | 1535 ई. | बहादुरशाह (गुजरात) | रानी कर्णावती (कर्मावती) |
| तृतीय साका | 1568 ई. | अकबर | जौहर — दुर्ग की स्त्रियाँ (नाम अपुष्ट) |
| क्रम | घटना |
|---|---|
| 1 | राणा साँगा की मृत्यु के बाद मेवाड़ में सत्ता-संघर्ष |
| 2 | बनवीर (पृथ्वीराज का अवैध पुत्र) ने ~1536 में विक्रमादित्य की हत्या की |
| 3 | बनवीर ने शिशु उदयसिंह को मारना चाहा |
| 4 | पन्ना धाय ने अपने पुत्र चंदन को राजकुमार की शय्या पर सुलाया |
| 5 | बनवीर ने चंदन को उदयसिंह समझकर मार डाला |
| 6 | पन्ना धाय ने उदयसिंह को कुम्भलगढ़ पहुँचाया (कोटवाल आशा शाह/आशा देपुरा के संरक्षण में) |
| 7 | 1540 ई. में उदयसिंह ने बनवीर को हराकर मेवाड़ का सिंहासन पुनः पाया |
| तथ्य | विवरण |
|---|---|
| संस्थापक | महाराणा उदयसिंह द्वितीय |
| स्थापना वर्ष | प्रचलित मत: 1559 ई. |
| स्थल | पिछोला झील के निकट, अरावली की घाटी |
| उदयसागर झील | निर्माण ~1559-1565 ई. |
| प्रेरणा (किंवदंती) | एक साधु/तपस्वी के परामर्श व आशीर्वाद से स्थल चयन |
| राजधानी बनना | 1568 में चित्तौड़ पतन के बाद व्यावहारिक राजधानी |
स्तंभ
चित्तौड़गढ़ दुर्ग के भीतर स्थित दो कीर्ति-स्तंभ राजस्थानी वास्तुकला और मध्यकालीन इतिहास के अनुपम प्रतीक हैं — विजय स्तंभ (जय स्तंभ) और कीर्ति स्तंभ। दोनों में मूलभूत अंतर धार्मिक व कालगत है: विजय स्तंभ 15वीं शताब्दी का हिंदू (वैष्णव) स्मारक है जिसे मेवाड़ के राणा कुम्भा ने अपनी सैन्य विजय के उपलक्ष्य में बनवाया, जबकि कीर्ति स्तंभ इससे लगभग तीन शताब्दी पूर्व 12वीं शताब्दी का दिगंबर जैन स्मारक है जिसे एक धनाढ्य जैन व्यापारी ने प्रथम तीर्थंकर आदिनाथ को समर्पित किया। परीक्षा की दृष्टि से इन दोनों के निर्माता, कालखंड, ऊँचाई, मंजिलों की संख्या तथा समर्पित देवता को अलग-अलग स्पष्ट रूप से याद रखना अनिवार्य है, क्योंकि RPSC व RAS प्रश्नों में इन्हें आपस में उलझाकर पूछा जाता है।
विजय स्तंभ का निर्माण मेवाड़ के प्रतापी शासक राणा कुम्भा (शासनकाल 1433–1468) ने माळवा के सुल्तान महमूद खिलजी (महमूद खिलजी प्रथम) पर सारंगपुर के युद्ध में प्राप्त विजय के स्मारक के रूप में करवाया। निर्माण प्रायः 1440 में आरंभ होकर 1448 ई. में पूर्ण माना जाता है। यह नौ (9) मंजिला भव्य स्तंभ लाल बलुआ पत्थर तथा सफेद संगमरमर से बना है, इसकी ऊँचाई लगभग 37.19 मीटर (लगभग 122 फीट) है और शिखर तक पहुँचने के लिए भीतर 157 सीढ़ियाँ बनी हैं। इसके प्रमुख वास्तुकार (सूत्रधार) जैता थे तथा उनके पुत्रों — नापा, पूजा एवं पोमा — ने भी निर्माण में सहयोग दिया, जिनके नाम स्तंभ पर उत्कीर्ण हैं। स्तंभ विष्णु को समर्पित होने के कारण इसे 'विष्णुध्वज' भी कहा गया है; इसकी दीवारों पर हिंदू देवी-देवताओं, विष्णु के अवतारों, रामायण-महाभारत के प्रसंगों तथा तत्कालीन सामाजिक जीवन की सैकड़ों प्रतिमाएँ अंकित हैं, जिसके कारण इसे 'भारतीय मूर्तिकला का विश्वकोश' कहा जाता है।
विजय स्तंभ की प्रशस्ति (शिलालेख) का महत्व अत्यधिक है — यह प्रशस्ति कवि अत्रि द्वारा रचना आरंभ की गई और उनकी मृत्यु के पश्चात उनके पुत्र महेश ने इसे पूर्ण किया। इस प्रशस्ति में मेवाड़ के गुहिल/सिसोदिया वंश की वंशावली, राणा कुम्भा की विजयों तथा उनके निर्माण-कार्यों का उल्लेख है, जो मेवाड़ के इतिहास का प्रमुख स्रोत है। एक रोचक तथ्य यह है कि हिंदू स्मारक होते हुए भी स्तंभ की कुछ मंजिलों पर अरबी में 'अल्लाह' शब्द उत्कीर्ण मिलता है, जिसे मध्यकालीन धार्मिक सहिष्णुता व शिल्पियों की समावेशी दृष्टि का प्रमाण माना जाता है।
कीर्ति स्तंभ, जिसे 'कीर्ति-स्तम्भ' या दिगंबर जैन स्तंभ कहा जाता है, विजय स्तंभ से पुराना है और 12वीं शताब्दी (कुछ मतानुसार लगभग 1300 ई. के आसपास तक) का निर्माण है। इसका निर्माण एक धनी दिगंबर जैन व्यापारी जीजाजी बघेरवाल (जीजा राठौड़/बघेरवाल) ने करवाया था और यह प्रथम जैन तीर्थंकर आदिनाथ (ऋषभदेव) को समर्पित है। यह सात (7) मंजिला स्तंभ लगभग 22 मीटर (लगभग 72 फीट) ऊँचा है, अर्थात विजय स्तंभ से नीचा और अधिक सादगीपूर्ण है। इसकी बाहरी दीवारों पर जैन तीर्थंकरों की अनेक नग्न (दिगंबर) प्रतिमाएँ उत्कीर्ण हैं तथा सबसे नीचे आदिनाथ की विशाल दिगंबर प्रतिमा है। परीक्षा-भ्रम से बचने के लिए स्मरणीय है — 'विजय=कुम्भा=विष्णु=9 मंजिल' तथा 'कीर्ति=जैन व्यापारी=आदिनाथ=7 मंजिल'।


| तथ्य | विजय स्तंभ | कीर्ति स्तंभ |
|---|---|---|
| निर्माता | राणा कुम्भा (मेवाड़) | जीजाजी बघेरवाल (दिगंबर जैन व्यापारी) |
| निर्माण काल | 1440–1448 ई. (15वीं सदी) | 12वीं शताब्दी (विजय स्तंभ से प्राचीन) |
| उद्देश्य/स्मृति | महमूद खिलजी (माळवा) पर सारंगपुर विजय | जैन धर्म-कीर्ति; आदिनाथ को समर्पित |
| समर्पित देवता | भगवान विष्णु ('विष्णुध्वज') | प्रथम तीर्थंकर आदिनाथ (ऋषभदेव) |
| धर्म | हिंदू (वैष्णव) | दिगंबर जैन |
| मंजिलें | 9 मंजिल | 7 मंजिल |
| ऊँचाई | लगभग 37.19 मी (~122 फीट) | लगभग 22 मी (~72 फीट) |
| सीढ़ियाँ | 157 सीढ़ियाँ | 54 सीढ़ियाँ (लगभग) |
| वास्तुकार | सूत्रधार जैता व पुत्र (नापा, पूजा, पोमा) | उल्लेख अस्पष्ट |
| प्रशस्ति रचयिता | अत्रि; पूर्ण महेश द्वारा | — |
| बिंदु | विवरण |
|---|---|
| अन्य नाम | जय स्तंभ / विष्णुध्वज |
| निर्माण सामग्री | लाल बलुआ पत्थर व सफेद संगमरमर |
| विजय-युद्ध | सारंगपुर का युद्ध (महमूद खिलजी प्रथम, माळवा) |
| शासनकाल (कुम्भा) | 1433–1468 ई. |
| विशेषता | हिंदू देवी-देवताओं की सैकड़ों प्रतिमाएँ; 'मूर्तिकला का विश्वकोश' |
| उल्लेखनीय अंकन | कुछ मंजिलों पर अरबी में 'अल्लाह' शब्द |
| बिंदु | विवरण |
|---|---|
| निर्माता | जीजाजी बघेरवाल (धनी दिगंबर जैन व्यापारी) |
| समर्पण | प्रथम तीर्थंकर आदिनाथ (ऋषभदेव) |
| शैली/अंकन | जैन तीर्थंकरों की नग्न (दिगंबर) प्रतिमाएँ |
| आधार-प्रतिमा | आदिनाथ की विशाल दिगंबर मूर्ति |
| तुलनात्मक स्थिति | विजय स्तंभ से प्राचीन, छोटा व सादा |
दुर्ग-रचना
चित्तौड़गढ़ दुर्ग मेवाड़ की गौरव-गाथा का केन्द्र है — बेड़च (बेराच) एवं गंभीरी नदियों के संगम-क्षेत्र में मेसा पठार पर लगभग 180 मीटर ऊँची पहाड़ी पर, करीब 700 एकड़ (280 हेक्टेयर) में फैला यह राजस्थान का सबसे विशाल दुर्ग है। गिरि-दुर्ग (पहाड़ी दुर्ग) की श्रेणी में गिने जाने वाले इस किले को 2013 में 'राजस्थान के पहाड़ी दुर्गों' के अन्तर्गत यूनेस्को विश्व धरोहर सूची में सम्मिलित किया गया। दुर्ग के भीतर महल, जैन-हिन्दू मंदिर, कीर्ति-विजय स्तंभ, अनेक जलाशय तथा सात रक्षा-प्रोल इसे एक स्वयंपूर्ण नगर-दुर्ग बनाते हैं। इसी दुर्ग ने तीन प्रसिद्ध शाके (साके) और जौहर देखे — 1303 (अलाउद्दीन खिलजी, रानी पद्मिनी), 1535 (बहादुरशाह गुजरात, रानी कर्णावती) तथा 1567-68 (अकबर, जयमल-पत्ता का साका)।
महलों में सबसे प्राचीन एवं भव्य 'राणा कुम्भा महल' है, जो महाराणा कुम्भा (1433-1468) से सम्बद्ध है; इसी के भूमिगत तहखानों में रानी पद्मिनी के जौहर की मान्यता जुड़ी है और यहीं भक्त-कवयित्री मीराबाई का निवास भी माना जाता है। 'पद्मिनी महल' जल-कुंड के मध्य बना श्वेत-भवन है, जिसके दर्पण में पद्मिनी का प्रतिबिम्ब देखने की जनश्रुति अलाउद्दीन खिलजी से जोड़ी जाती है। ब्रिटिश-कालीन 'फतह प्रकाश महल' महाराणा फतहसिंह (1884-1930) द्वारा निर्मित है और आज पुरातत्त्व-संग्रहालय के रूप में प्रयुक्त होता है। कुम्भा-कालीन 'शृंगार चँवरी' वस्तुतः शांतिनाथ को समर्पित एक अलंकृत जैन मंदिर है (लगभग 1448), जो अपने तोरण एवं शिल्प-सौन्दर्य के लिए विख्यात है।
दुर्ग के मंदिर स्थापत्य की दृष्टि से अत्यन्त समृद्ध हैं। महाराणा कुम्भा द्वारा पुनर्निर्मित 'कुम्भश्याम मंदिर' (कुम्भस्वामी) वराह-विष्णु को समर्पित इंडो-आर्यन शैली का मंदिर है, जिसके परिसर से मीराबाई की भक्ति जुड़ी है; समीप ही 'मीरा मंदिर' है। 'कालिका माता मंदिर' मूलतः 8वीं शताब्दी का सूर्य मंदिर था, जो उत्तरकाल में देवी कालिका को समर्पित कर दिया गया — यह परीक्षा में बार-बार पूछा जाने वाला रूपान्तरण-तथ्य है। परमार भोज-कालीन 'समिद्धेश्वर (समाधीश्वर) मंदिर' त्रिमूर्ति-शिव को समर्पित है, जिसका जीर्णोद्धार महाराणा मोकल ने कराया। 'तुलजा भवानी मंदिर' तथा सत्ताईस जैन देवालयों का समूह 'सतबीस देवरी' भी दुर्ग की धार्मिक विविधता के प्रतीक हैं।
जल-प्रबन्धन इस दुर्ग की सैन्य-शक्ति का आधार था। कहा जाता है कि दुर्ग में कभी 84 जलाशय (कुंड, बावड़ी, तालाब) थे, जिनकी जल-संग्रह क्षमता इतनी विशाल थी कि पचास हजार सैनिकों की सेना को वर्षों तक जल दे सके; आज इनमें से कुछ ही सुरक्षित हैं। इनमें प्राकृतिक झरने से पोषित पवित्र 'गौमुख कुंड' सर्वाधिक प्रसिद्ध है, जहाँ गाय के मुख-आकृति से जल गिरता है; 'हाथी कुंड' भी उल्लेखनीय है।
दुर्ग की चढ़ाई सात विशाल रक्षा-प्रोलों (द्वारों) से होकर गुजरती है, जो क्रमशः शत्रु एवं हाथी-आक्रमण को रोकने हेतु बनाए गए थे — पादन (पाडन) प्रोल, भैरों प्रोल, हनुमान प्रोल, गणेश प्रोल, जोरला प्रोल, लक्ष्मण प्रोल एवं अन्त में विशालतम राम प्रोल। इन्हीं प्रोलों के बीच 1567-68 के अकबर-आक्रमण में वीरगति प्राप्त 'जयमल (मेड़तिया) एवं पत्ता (सिसोदिया/चूंडावत)' की छतरियाँ (स्मारक) स्थित हैं; इनकी वीरता से प्रभावित होकर अकबर ने आगरा दुर्ग के द्वार पर इनकी गजारूढ़ प्रतिमाएँ स्थापित करवाईं — यह तथ्य परीक्षा-दृष्टि से अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है।





| भवन | सम्बद्ध शासक/निर्माता | विशेष तथ्य |
|---|---|---|
| राणा कुम्भा महल | महाराणा कुम्भा (1433-1468) | दुर्ग का सबसे प्राचीन/भव्य महल; भूमिगत तहखानों में पद्मिनी जौहर की मान्यता; मीराबाई का निवास |
| पद्मिनी महल | रावल रतनसिंह-काल से सम्बद्ध | जल-कुंड के मध्य श्वेत भवन; दर्पण-प्रतिबिम्ब की जनश्रुति (अलाउद्दीन खिलजी) |
| फतह प्रकाश महल | महाराणा फतहसिंह (1884-1930) | आधुनिक निर्माण; वर्तमान में पुरातत्त्व संग्रहालय |
| शृंगार चँवरी | कुम्भा-काल (~1448) | शांतिनाथ को समर्पित अलंकृत जैन मंदिर; सुन्दर तोरण-शिल्प |
| मंदिर | समर्पित/देवता | निर्माण/जीर्णोद्धार व तथ्य |
|---|---|---|
| कुम्भश्याम मंदिर | वराह-विष्णु | कुम्भा द्वारा पुनर्निर्मित (~1449), इंडो-आर्यन शैली; मीरा-भक्ति से जुड़ा |
| मीरा मंदिर | कृष्ण/मीराबाई | कुम्भश्याम परिसर के निकट; भक्ति-परम्परा का केन्द्र |
| कालिका माता मंदिर | मूलतः सूर्य (बाद में कालिका) | 8वीं सदी का सूर्य मंदिर; उत्तरकाल में देवी कालिका को समर्पित |
| समिद्धेश्वर (समाधीश्वर) | शिव (त्रिमूर्ति) | परमार भोज-काल (11वीं सदी); जीर्णोद्धार महाराणा मोकल |
| तुलजा भवानी | देवी भवानी | शक्ति-उपासना केन्द्र |
| सतबीस देवरी | जैन (27 देवालय) | जैन तीर्थंकरों को समर्पित मंदिर-समूह |
| जलस्रोत | विशेषता |
|---|---|
| गौमुख कुंड | प्राकृतिक झरने से पोषित पवित्र कुंड; गोमुख-आकृति से जलधारा |
| हाथी कुंड | दुर्ग का प्रमुख जलाशय |
| 84 जलाशय (कुल) | कुंड/बावड़ी/तालाब मिलाकर; विशाल जल-संग्रह क्षमता — दीर्घ घेराबंदी में सैन्य-आधार |
| क्रम | प्रोल | टिप्पणी |
|---|---|---|
| 1 | पादन (पाडन) प्रोल | प्रथम/सबसे नीचे का द्वार |
| 2 | भैरों प्रोल | निकट जयमल-कल्ला स्मारक-क्षेत्र |
| 3 | हनुमान प्रोल | — |
| 4 | गणेश प्रोल | — |
| 5 | जोरला प्रोल | लक्ष्मण प्रोल से जुड़ा |
| 6 | लक्ष्मण प्रोल | — |
| 7 | राम प्रोल | अन्तिम एवं विशालतम मुख्य द्वार |
| वर्ष | आक्रमणकारी | सम्बद्ध व्यक्ति/जौहर |
|---|---|---|
| 1303 | अलाउद्दीन खिलजी | रावल रतनसिंह; रानी पद्मिनी का जौहर |
| 1535 | बहादुरशाह (गुजरात) | रानी कर्णावती का जौहर |
| 1567-68 | अकबर | जयमल-पत्ता का साका |
व्यक्तित्व
चित्तौड़गढ़ दुर्ग केवल पाषाण-प्राचीरों का समूह नहीं, अपितु राजस्थानी शौर्य, भक्ति, त्याग और सांस्कृतिक उत्कर्ष का जीवंत संग्रहालय है। यहाँ भक्ति-आंदोलन की सर्वोच्च प्रतीक मीराबाई की कृष्ण-साधना, पन्ना धाय के अद्वितीय आत्म-त्याग, राणा कुम्भा के संगीत-स्थापत्य वैभव, तथा राणा सांगा के अंतिम हिंदू-प्रतिरोध की स्मृतियाँ एक साथ गुँथी हुई हैं। RAS एवं RPSC EO/RO परीक्षाओं की दृष्टि से इस दुर्ग से जुड़े व्यक्तित्व, उनके उपनाम, ग्रंथ, अभिलेख तथा विदेशी वर्णन बार-बार प्रश्न-रूप में लौटते हैं, अतः इन्हें कालक्रम एवं कारण-परिणाम सहित स्मरण करना अनिवार्य है।
मीराबाई (लगभग 1498–1547) मेड़ता के राठौड़ रत्नसिंह की पुत्री थीं, जिनका विवाह लगभग 1516 में महाराणा सांगा के ज्येष्ठ पुत्र भोजराज से हुआ; 1521 में भोजराज की मृत्यु के पश्चात मीरा पूर्णतः कृष्ण-भक्ति में लीन हो गईं। उनके गुरु संत रैदास (रविदास) माने जाते हैं। 'पदावली', 'नरसीजी रो मायरो', 'राग गोविंद', 'राग सोरठ' तथा 'गीत गोविंद की टीका' उनकी प्रसिद्ध रचनाएँ हैं। चित्तौड़ दुर्ग स्थित 'मीरा मंदिर' (कुम्भश्याम मंदिर परिसर) उनकी भक्ति-स्मृति का केंद्र है। इसके विपरीत पन्ना धाय ने त्याग की पराकाष्ठा प्रस्तुत की — जब बनवीर ने उदयसिंह (द्वितीय) की हत्या का षड्यंत्र रचा, तब पन्ना धाय ने अपने पुत्र चंदन को राजकुमार के स्थान पर सुला कर बलिदान दे दिया और उदयसिंह को कुम्भलगढ़ भेजकर मेवाड़ के भावी शासक की रक्षा की (लगभग 1535–36)।
राणा कुम्भा (शासनकाल 1433–1468) मेवाड़ के स्वर्णयुग के निर्माता थे — योद्धा, स्थापत्यकार, संगीतज्ञ एवं विद्वान। मालवा के महमूद खिलजी पर विजय के उपलक्ष्य में उन्होंने विजय स्तंभ (कीर्ति की चरम अभिव्यक्ति) का निर्माण करवाया। संगीत के क्षेत्र में उनका 'संगीतराज' अद्वितीय है, तथा जयदेव के 'गीत गोविंद' पर लिखी उनकी टीका 'रसिकप्रिया' प्रसिद्ध है; 'सूडप्रबंध' एवं 'कामराज रतिसार' भी उनकी रचनाएँ मानी जाती हैं। उन्हें 'अभिनव भरताचार्य', 'हिंदू सुरत्राण', 'राणा रासो', 'दानगुरु/छापगुरु' आदि उपनाम प्राप्त थे। राणा सांगा (संग्रामसिंह, 1509–1528) मेवाड़ के अंतिम महान हिंदू सम्राट कहे जाते हैं, जिन्होंने खातौली, बाड़ी एवं अंततः खानवा (16 मार्च 1527) में इब्राहीम लोदी व बाबर से संघर्ष किया; कहा जाता है कि उनके शरीर पर लगभग 80 घाव थे, एक हाथ, एक आँख एवं एक पैर की क्षति उन्होंने युद्धों में सही थी।
दुर्ग के दो प्रमुख स्तंभ — विजय स्तंभ एवं कीर्ति स्तंभ — इसके स्थापत्य-गौरव के प्रतीक हैं। विजय स्तंभ के अभिलेख (प्रशस्ति) की रचना कवि अत्रि ने आरंभ की तथा उनके पुत्र कवि महेश ने पूर्ण की; इस प्रशस्ति में मेवाड़ के गुहिल शासकों की वंशावली उत्कीर्ण है। चित्तौड़ का विस्तृत वर्णन अकबर के दरबारी इतिहासकार अबुल फजल ने 'आइन-ए-अकबरी' में किया है। वर्ष 2013 में यूनेस्को ने चित्तौड़गढ़ को 'राजस्थान के पहाड़ी दुर्गों' (Hill Forts of Rajasthan) के अंतर्गत विश्व धरोहर घोषित किया। परीक्षा की दृष्टि से सर्वाधिक भ्रम-बिंदु 'प्रथम साका' का है — राजस्थान का प्रथम साका रणथंभौर में 1301 (हम्मीरदेव चौहान बनाम अलाउद्दीन खिलजी) में हुआ, जबकि चित्तौड़ का प्रथम साका 1303 में (अलाउद्दीन बनाम रावल रतनसिंह) हुआ। अभ्यर्थी प्रायः इन दोनों तिथियों को मिला देते हैं।
| व्यक्तित्व | काल/संबंध | प्रमुख योगदान/तथ्य |
|---|---|---|
| मीराबाई | लगभग 1498–1547; भोजराज (सांगा-पुत्र) की पत्नी | कृष्ण-भक्त कवयित्री; गुरु रैदास; रचनाएँ — पदावली, राग गोविंद, राग सोरठ, नरसीजी रो मायरो; चित्तौड़ में मीरा मंदिर |
| पन्ना धाय | लगभग 1535–36; उदयसिंह द्वितीय की धाय | बनवीर से उदयसिंह को बचाने हेतु अपने पुत्र चंदन का बलिदान; त्याग की प्रतिमूर्ति |
| राणा कुम्भा | शासन 1433–1468 | विजय स्तंभ निर्माता; ग्रंथ — संगीतराज, रसिकप्रिया, सूडप्रबंध; उपनाम — अभिनव भरताचार्य, हिंदू सुरत्राण |
| राणा सांगा (संग्रामसिंह) | शासन 1509–1528 | खानवा युद्ध (1527) में बाबर से संघर्ष; शरीर पर ~80 घाव; अंतिम महान हिंदू प्रतिरोध |
| कवि अत्रि एवं महेश | कुम्भा-काल (15वीं सदी) | पिता अत्रि ने विजय स्तंभ प्रशस्ति आरंभ की, पुत्र महेश ने पूर्ण की |
| श्रेणी | विवरण |
|---|---|
| संगीत ग्रंथ | संगीतराज (प्रमुख), संगीत मीमांसा, सूडप्रबंध |
| साहित्यिक टीका | रसिकप्रिया (जयदेव के गीत गोविंद पर टीका) |
| अन्य रचनाएँ | कामराज रतिसार, संगीत रत्नाकर की टीका |
| उपनाम | अभिनव भरताचार्य, हिंदू सुरत्राण, राणा रासो, दानगुरु/छापगुरु, नंदिकेश्वर अवतार |
| स्थापत्य | विजय स्तंभ, कुम्भलगढ़ दुर्ग, कुम्भश्याम मंदिर, अनेक दुर्ग (कुल 32 दुर्गों में से अनेक) |
| तथ्य | विजय स्तंभ | कीर्ति स्तंभ |
|---|---|---|
| निर्माता | राणा कुम्भा | जैन व्यापारी जीजा/जीजाजी बघेरवाल |
| काल | 1440–1448 ई. | 12वीं शताब्दी (लगभग) |
| समर्पित/उपलक्ष्य | महमूद खिलजी (मालवा) पर विजय; विष्णु को समर्पित | प्रथम जैन तीर्थंकर आदिनाथ को समर्पित |
| मंज़िल/ऊँचाई | 9 मंज़िल, लगभग 37 मीटर | 7 मंज़िल, लगभग 22 मीटर |
| प्रशस्ति-रचयिता | कवि अत्रि व पुत्र महेश | — |
| साका | वर्ष | आक्रमणकारी बनाम रक्षक | जौहर-नेतृत्व |
|---|---|---|---|
| रणथंभौर प्रथम साका | 1301 | अलाउद्दीन खिलजी बनाम हम्मीरदेव चौहान | रंगदेवी (परंपरा) |
| चित्तौड़ प्रथम साका | 1303 | अलाउद्दीन खिलजी बनाम रावल रतनसिंह | रानी पद्मिनी |
| चित्तौड़ द्वितीय साका | 1535 | बहादुर शाह (गुजरात) बनाम विक्रमादित्य | रानी कर्णावती |
| चित्तौड़ तृतीय साका | 1568 | अकबर बनाम जयमल-पत्ता (शासक उदयसिंह द्वितीय) | जौहर — दुर्ग की स्त्रियाँ (नाम अपुष्ट) |
| तथ्य | विवरण |
|---|---|
| यूनेस्को विश्व धरोहर | 2013 में 'राजस्थान के पहाड़ी दुर्ग' के अंतर्गत — चित्तौड़गढ़, कुम्भलगढ़, रणथंभौर, आमेर, जैसलमेर, गागरोन (कुल 6) |
| विदेशी/समकालीन वर्णन | अबुल फजल — आइन-ए-अकबरी में चित्तौड़ का वर्णन |
| दुर्ग-श्रेणी | गिरि दुर्ग (पहाड़ी दुर्ग); मेवाड़ की प्राचीन राजधानी |
| उपनाम | 'राजस्थान का गौरव', 'दुर्गों का सिरमौर', 'चित्रकूट' |
| प्रमुख जलाशय/स्थल | गौमुख कुंड, विजय स्तंभ, कीर्ति स्तंभ, पद्मिनी महल, कालिका माता मंदिर, मीरा मंदिर |
स्रोत
यह नोट तथ्य-सत्यापन (audit) से गुज़रा है — 18 त्रुटियाँ (जौहर-तिथियाँ, शासक-नाम, दुर्ग-वर्ग, माप आदि) खोजी व सुधारी गईं। जहाँ स्रोतों में मतभेद है, वहाँ प्रत्येक अनुभाग के अंत में "⚠ सत्यापन हेतु" में स्पष्ट किया गया है।
| प्रकार | स्रोत |
|---|---|
| सामग्री-आधार | विकिपीडिया — चित्तौड़गढ़ दुर्ग एवं संबंधित लेख (बप्पा रावल, राणा साँगा/कुम्भा, उदयसिंह द्वितीय, तीनों घेरे 1303/1535/1567-68, जयमल-पत्ता, मीराबाई); ये लेख ASI, इतिहासकार गांगुली/सोमानी एवं अकबरनामा को उद्धृत करते हैं |
| चित्र | Wikimedia Commons (CC BY-SA / सार्वजनिक डोमेन); प्रत्येक चित्र के नीचे लाइसेंस अंकित |
| रेखाचित्र/मानचित्र | कस्टम SVG (इसी नोट हेतु निर्मित) |
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