RPSC EO/RO · राजस्थान के दुर्ग · PA1.T11

चित्तौड़गढ़

दुर्ग · मेवाड़ का हृदय · गढ़ों का सिरमौर

भारत का क्षेत्रफल की दृष्टि से सबसे बड़ा दुर्ग, आठ शताब्दियों तक मेवाड़ की राजधानी, और तीन जौहर व तीन साकों का साक्षी।

~700एकड़ · सबसे बड़ा
~180 मीऊँचाई
7प्रोल
3जौहर
2013UNESCO

उद्भव

चित्तौड़गढ़ दुर्ग: उद्भव, नामकरण, प्राचीन (मौर्य-मोरी) काल एवं भौगोलिक स्वरूप

चित्तौड़गढ़ राजस्थान का सर्वाधिक विशाल एवं ऐतिहासिक दृष्टि से गौरवशाली दुर्ग है, जिसे 'राजस्थान के दुर्गों का सिरमौर', 'दुर्गों का तीर्थराज' तथा 'गढ़ों का गढ़' कहा जाता है। इसकी परिकल्पना एक 'गिरि दुर्ग' (पहाड़ी दुर्ग) के रूप में की जाती है, क्योंकि यह मेसा नामक पठार/पहाड़ी पर स्थित है। दुर्ग का उद्भव अत्यंत प्राचीन है और इसका श्रेय परंपरागत रूप से मौर्य (मोरी) वंश के शासक चित्रांगद मोरी को दिया जाता है। मान्यता है कि चित्रांगद मोरी ने इस दुर्ग का निर्माण करवाया और अपने नाम पर इसे 'चित्रकूट' कहा, जो कालांतर में अपभ्रंश होकर 'चित्तौड़' बन गया। इस प्रकार दुर्ग के नामकरण की जड़ें मोरी शासक के व्यक्तिवाचक नाम में निहित हैं।

चित्तौड़गढ़ दुर्ग — मेसा पठार पर विस्तृत।
चित्तौड़गढ़ दुर्ग — मेसा पठार पर विस्तृत।स्रोत: Wikimedia Commons · CC BY-SA 3.0

नाम की व्युत्पत्ति के संबंध में विद्वानों में मतभेद है, किंतु सर्वाधिक प्रचलित एवं परीक्षा-दृष्टि से स्वीकृत मत यही है कि 'चित्रांगद मोरी' → 'चित्रकूट' → 'चित्तौड़' के क्रम में नाम विकसित हुआ। यहाँ 'गढ़' शब्द दुर्ग/किले का द्योतक है, अतः चित्तौड़ का दुर्ग 'चित्तौड़गढ़' कहलाया। प्रारंभिक काल में यह क्षेत्र मोरी (मौर्य) शासकों के अधीन रहा, जो स्थानीय शक्तिशाली राजवंश थे। ध्यातव्य है कि ये 'मोरी' मगध के मौर्य साम्राज्य (चंद्रगुप्त मौर्य) से भिन्न, राजस्थान का स्थानीय मौर्य/मोरी राजवंश माने जाते हैं।

दुर्ग के प्राचीन इतिहास में जल-संरचनाओं तथा पौराणिक अनुश्रुतियों का विशेष स्थान है। दुर्ग परिसर के भीतर स्थित 'भीमलत' (भीम-कुंड) से महाभारतकालीन पांडव भीम की जनश्रुति जुड़ी है — कहा जाता है कि भीम ने एक ही प्रहार/लात से यहाँ जल-स्रोत उत्पन्न किया, इसी कारण इसे 'भीमलत' कहा गया। इसी प्रकार दुर्ग के भीतर अनेक कुंड, तालाब एवं जलाशय हैं, जिनमें मानसरोवर (मानसरोवर झील), गौमुख कुंड आदि प्रमुख हैं; ये जल-स्रोत दुर्ग को लंबे घेरे (अवरोध) में भी आत्मनिर्भर बनाते थे और इसकी सामरिक शक्ति के मूल आधार थे।

मोरी शासन के पश्चात दुर्ग गुहिल (गहलोत/सिसोदिया) वंश के अधिकार में आया। परंपरा के अनुसार लगभग 734 ई. (कुछ स्रोतों में 728 ई.) में मेवाड़ के गुहिल वंश के प्रवर्तक बप्पा रावल (कालभोज) ने मोरी शासक (जनश्रुति में मानमोरी/मनुराज (मान मोरी)) से यह दुर्ग प्राप्त किया। इसी घटना के साथ चित्तौड़ मेवाड़ की राजधानी एवं गुहिल-सिसोदिया शक्ति का केंद्र बना और लगभग आठवीं शताब्दी से सोलहवीं शताब्दी तक मेवाड़ का प्रमुख केंद्र रहा (यद्यपि प्रारंभिक गुहिल शासक नागदा-आहड़ से शासन करते थे; चित्तौड़ का प्रमुख राजधानी-रूप में उभार 14वीं सदी के बाद सुदृढ़ हुआ, और 1568 में अकबर के अधिकार से पूर्व ही उदयसिंह ने राजधानी उदयपुर की ओर स्थानांतरित करनी आरंभ कर दी थी)। बप्पा रावल द्वारा दुर्ग प्राप्ति की यह तिथि (परंपरागत 734 ई.; कुछ स्रोतों में 728 ई.) परीक्षा में महत्वपूर्ण है।

भौगोलिक दृष्टि से चित्तौड़गढ़ दुर्ग बेड़च (बेराच) एवं गंभीरी नदियों के संगम-क्षेत्र के निकट, मेसा पठार पर स्थित है। दुर्ग एक विशाल, मछली/व्हेल के आकार जैसी लंबी पहाड़ी पर फैला है। इसकी लंबाई लगभग 5 किमी तथा यह सैकड़ों एकड़ (लगभग 700 एकड़/280 हेक्टेयर के आसपास) क्षेत्र में विस्तृत है। पहाड़ी आसपास के मैदान से लगभग 180 मीटर (लगभग 500-600 फुट) ऊँची उठी है, जिससे दुर्ग को प्राकृतिक सुरक्षा प्राप्त होती है। बेड़च व गंभीरी नदियाँ दुर्ग के प्राकृतिक जल-अवरोध व जल-आपूर्ति का कार्य करती थीं, और यही भूगोल इसे अभेद्य दुर्गों में गिनवाता है।

अरावली बेड़च चित्तौड़गढ़ उदयपुर जयपुर जोधपुर अजमेर
चित्तौड़गढ़ (●) — बेड़च नदी पर, दक्षिण-पूर्वी राजस्थान में।
नामकरण एवं व्युत्पत्ति — स्मरण-सारणी
तथ्यविवरण
मूल नामचित्रकूट (चित्रांगद मोरी के नाम पर)
व्युत्पत्ति-क्रमचित्रांगद मोरी → चित्रकूट → चित्तौड़ → चित्तौड़गढ़
निर्माता (परंपरा)चित्रांगद मोरी (मौर्य/मोरी वंश)
'गढ़' का अर्थदुर्ग/किला
उपनामदुर्गों का सिरमौर, दुर्गों का तीर्थराज, गढ़ों का गढ़
दुर्ग वर्गगिरि दुर्ग (पहाड़ी दुर्ग)
प्राचीन-प्रारंभिक इतिहास — मोरी से गुहिल
काल/तिथिघटना
प्राचीन कालमोरी (मौर्य) वंश का शासन; चित्रांगद मोरी द्वारा दुर्ग-निर्माण
लगभग 734 ई.बप्पा रावल (कालभोज) द्वारा मोरी शासक से दुर्ग की प्राप्ति
परिणामचित्तौड़ मेवाड़ की राजधानी व गुहिल-सिसोदिया शक्ति का केंद्र बना
अंतिम मोरी शासक (जनश्रुति)मानमोरी / मनुराज (मान मोरी)
1568 ई.अकबर द्वारा चित्तौड़ पर अधिकार (राजधानी उदयपुर स्थानांतरित)
भूगोल — तथ्य-सारणी
तथ्यविवरण
स्थितिमेसा पठार/पहाड़ी पर, चित्तौड़गढ़ (राजस्थान)
प्रमुख नदियाँबेड़च (बेराच) एवं गंभीरी
पहाड़ी की ऊँचाईआसपास के मैदान से लगभग 180 मीटर
दुर्ग की लंबाईलगभग 5 किमी
क्षेत्रफल (लगभग)लगभग 700 एकड़ / ~280 हेक्टेयर
आकृतिलंबी, मछली/व्हेल-सदृश पहाड़ी
प्रमुख जलाशयमानसरोवर, गौमुख कुंड, भीमलत कुंड
मुख्य तथ्यचित्तौड़गढ़ का नामकरण मौर्य/मोरी शासक चित्रांगद मोरी के नाम पर हुआ (चित्रकूट → चित्तौड़)। बप्पा रावल (कालभोज) ने लगभग 734 ई. में मोरी शासक से यह दुर्ग प्राप्त किया — यही मेवाड़ के गुहिल वंश की चित्तौड़ में स्थापना है।
मुख्य तथ्यचित्तौड़गढ़ एक गिरि दुर्ग है, जो मेसा पठार पर बेड़च (बेराच) एवं गंभीरी नदियों के निकट स्थित है; पहाड़ी मैदान से लगभग 180 मीटर ऊँची और दुर्ग लगभग 5 किमी लंबा है।
परीक्षा-भ्रमयहाँ के 'मोरी/मौर्य' राजस्थान के स्थानीय राजवंश थे — इन्हें मगध के मौर्य साम्राज्य (चंद्रगुप्त मौर्य) से न जोड़ें। साथ ही चित्तौड़ का 'चित्रकूट' उत्तर प्रदेश के तीर्थ चित्रकूट से भिन्न है।
परीक्षा-भ्रमदुर्ग को घेरने/जल देने वाली नदियों को अक्सर उलझाया जाता है — सही नाम बेड़च (बेराच) एवं गंभीरी हैं। ऊँचाई/क्षेत्रफल के आँकड़े स्रोतानुसार थोड़े भिन्न मिलते हैं, अतः 'लगभग' के साथ याद रखें।
स्मरण-सूत्रस्मरण-सूत्र: 'चित्रांगद ने चित्रकूट रचा, बप्पा ने 734 में मोरी से जीता' — और भीमलत को याद रखने के लिए सोचें कि बलशाली भीम ने एक ही लात से पहाड़ी पर जल-कुंड बना दिया।
⚠ सत्यापन हेतु (5)
  • बप्पा रावल द्वारा चित्तौड़ प्राप्ति की तिथि 734 ई. परंपरागत/जनश्रुति आधारित है; कुछ इतिहासकार इसे किंवदंती मानते हैं और वास्तविक गुहिल-अधिकार को कुछ बाद का मानते हैं।
  • जिस अंतिम मोरी शासक से बप्पा रावल ने दुर्ग लिया उसका नाम (मानमोरी/मान सिंह मोरी) स्रोतों में एकमत नहीं है।
  • पहाड़ी की सटीक ऊँचाई (~180 मीटर) एवं दुर्ग का क्षेत्रफल (~700 एकड़/280 हेक्टेयर) व लंबाई (~5 किमी) स्रोतानुसार थोड़े भिन्न आँकड़ों में मिलते हैं।
  • भीमलत/मानसरोवर से जुड़ी पांडव-भीम की कथा अनुश्रुति है, ऐतिहासिक रूप से प्रमाणित नहीं।
  • बप्पा रावल की चित्तौड़-प्राप्ति की तिथि (728/734 ई.) व 'अंतिम मोरी शासक' का नाम — विद्वानों में विवादित; प्रसंग अर्ध-किंवदंती है।

कालक्रम

चित्तौड़गढ़ दुर्ग — मेवाड़ का विस्तृत शासक-कालक्रम (बप्पा रावल से उदयसिंह द्वितीय तक)

चित्तौड़गढ़ मेवाड़ के गुहिल-सिसोदिया राजवंश की राजनीतिक और भावनात्मक राजधानी रहा है। परंपरा के अनुसार दुर्ग का मूल निर्माण मौर्य (मोरी) शासक चित्रांग (चित्रांगद मोरी) से जोड़ा जाता है, जिसके नाम पर 'चित्रकूट' या चित्तौड़ नाम पड़ा। लगभग 8वीं शताब्दी में बप्पा रावल ने मोरी शासक 'मान मोरी' से यह दुर्ग प्राप्त कर गुहिल वंश की स्थापना की — यहीं से मेवाड़ का सुदीर्घ शासक-कालक्रम आरम्भ होता है, जो लगभग आठ शताब्दियों तक चित्तौड़ को केंद्र बनाकर चला।

चित्तौड़ के इतिहास की धुरी उसके तीन साके (शाका) और तीन जौहर हैं। प्रथम साका 1303 ई. में अलाउद्दीन खलजी के आक्रमण के समय (रानी पद्मिनी से संबद्ध), द्वितीय साका 1535 ई. में गुजरात के बहादुरशाह के आक्रमण के समय (रानी कर्णावती से संबद्ध), और तृतीय साका 1568 ई. में अकबर के आक्रमण के समय (जयमल-पत्ता की वीरता से संबद्ध) घटित हुआ। इन तीनों के बीच के शासक — विशेषकर हम्मीर, कुम्भा, सांगा और उदयसिंह — मेवाड़ के उत्थान और पुनरुत्थान के प्रतीक हैं।

1303 में चित्तौड़ खोने के बाद रावल शाखा का पतन हुआ और सिसोदिया शाखा का उदय हुआ। राणा हम्मीर सिंह ने लगभग 1326 ई. में चित्तौड़ पुनः प्राप्त कर सिसोदिया वंश की नींव रखी; इसी वंश ने आगे राणा कुम्भा और राणा सांगा के काल में मेवाड़ को उत्तर भारत की सर्वप्रमुख राजपूत शक्ति बना दिया। राणा कुम्भा ने माळवा के महमूद खलजी पर विजय (1440) के उपलक्ष्य में विश्वप्रसिद्ध विजय स्तंभ का निर्माण करवाया, तो राणा सांगा ने खातोली, बाड़ी और अंततः 1527 की खानवा में बाबर से युद्ध कर मेवाड़ की प्रतिष्ठा को शिखर पर पहुँचाया।

सांगा की मृत्यु (1528) के बाद मेवाड़ में उत्तराधिकार-संघर्ष तीव्र हुआ। विक्रमादित्य के दुर्बल शासन में 1535 का द्वितीय जौहर हुआ; फिर सिंहासन-लोलुप बनवीर ने विक्रमादित्य की हत्या कर दी और शिशु उदयसिंह को मारना चाहा, किन्तु स्वामिभक्त धाय पन्ना धाय ने अपने पुत्र चंदन का बलिदान देकर उदयसिंह की रक्षा की। 1540 में उदयसिंह द्वितीय ने बनवीर को पराजित कर मेवाड़ का सिंहासन पुनः प्राप्त किया, 1559 में उदयपुर की स्थापना की, और उन्हीं के काल में 1567-68 में अकबर के आक्रमण एवं तृतीय जौहर के साथ चित्तौड़ का महत्त्व इतिहास में अमर हो गया।

लगभग 734 ई.
बप्पा रावल — गुहिल वंश की स्थापना
बप्पा रावल ने मोरी (मौर्य) शासक मान मोरी से चित्तौड़ दुर्ग प्राप्त कर मेवाड़ में गुहिल वंश की नींव रखी। परंपरा में दुर्ग का मूल निर्माण चित्रांग मोरी से जोड़ा जाता है, जिससे 'चित्रकूट' नाम पड़ा।
1226-27 ई.
जैत्रसिंह — इल्तुतमिश का नागदा आक्रमण विफल
रावल जैत्रसिंह के काल में दिल्ली सुल्तान इल्तुतमिश ने मेवाड़ की तत्कालीन राजधानी नागदा पर आक्रमण किया, जिसे जैत्रसिंह ने विफल किया। यह चित्तौड़-केन्द्रित गुहिल शक्ति के सुदृढ़ीकरण का काल था।
1303 ई.
रत्नसिंह — अलाउद्दीन खलजी का घेरा व प्रथम जौहर
अलाउद्दीन खलजी ने चित्तौड़ पर घेरा डाला; रानी पद्मिनी की कथा से संबद्ध प्रथम जौहर हुआ और दुर्ग पतित हुआ। अलाउद्दीन ने इसे अपने पुत्र खिज्र खाँ को सौंपकर नाम 'खिज्राबाद' रखा — रावल शाखा के पतन का बिंदु।
1303 के पश्चात्
चित्तौड़ मालदेव सोनगरा को
चित्तौड़ छोड़ने से पूर्व अलाउद्दीन ने दुर्ग का प्रशासन जालोर के सोनगरा राजपूत मालदेव को सौंपा। यह अवधि मेवाड़ के लिए राजनीतिक शून्यकाल थी, जब सिसोदिया शाखा पुनरुत्थान की तैयारी कर रही थी।
लगभग 1326 ई.
हम्मीर सिंह — चित्तौड़ की पुनः प्राप्ति व सिसोदिया वंश
राणा हम्मीर सिंह ने मालदेव/उसके उत्तराधिकारी से चित्तौड़ पुनः जीतकर मेवाड़ में सिसोदिया वंश की स्थापना की। उन्हें 'विषम घाटी पंचानन' कहा गया; वे सिसोदिया शाखा के प्रथम महान शासक माने जाते हैं।
1364-1382 ई.
क्षेत्रसिंह (खेता) — मेवाड़ का विस्तार
हम्मीर के पुत्र क्षेत्रसिंह ने मेवाड़ की सीमाओं का विस्तार किया और माळवा दिशा में सैन्य सफलताएँ अर्जित कीं, जिससे चित्तौड़ पुनः शक्ति-केंद्र बना।
1382-1421 ई.
राणा लाखा — जावर खानें व निर्माण-कार्य
राणा लाखा (लक्ष्यसिंह) के काल में जावर की चाँदी व जस्ता खानों से मेवाड़ की आर्थिक समृद्धि बढ़ी। गंभीरी बांध व पिछोला झील से संबद्ध निर्माण-कार्यों का श्रेय भी इसी काल को दिया जाता है।
1421-1433 ई.
राणा मोकल — समाधीश्वर मंदिर जीर्णोद्धार
राणा मोकल ने चित्तौड़ में समाधीश्वर (शिव) मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया। अल्पायु में उनकी हत्या हुई, जिसके बाद उनके पुत्र कुम्भा सत्तासीन हुए।
1433-1468 ई.
राणा कुम्भा — विजय स्तंभ व स्वर्णयुग
राणा कुम्भा ने 1440 में माळवा के महमूद खलजी पर विजय के उपलक्ष्य में चित्तौड़ में विजय स्तंभ (1440-1448) का निर्माण करवाया। वे स्थापत्य-प्रेमी, संगीतज्ञ (संगीतराज, रसिकप्रिया) एवं अनेक दुर्गों के निर्माता थे।
1468 ई.
उदा (उदयसिंह प्रथम) — कुम्भा की हत्या
सत्तालोलुप पुत्र उदा (उदयसिंह प्रथम) ने चित्तौड़ में अपने पिता राणा कुम्भा की हत्या कर सिंहासन हड़पा। यह मेवाड़ के इतिहास का कलंकपूर्ण पितृघात-प्रसंग है; कुछ ही वर्षों बाद वज्रपात से उसकी मृत्यु हो गई।
1473-1509 ई.
राणा रायमल — पुनः स्थिरता
राणा रायमल ने मेवाड़ में पुनः स्थिरता स्थापित की। उनके पुत्रों — पृथ्वीराज, जयमल व संग्रामसिंह — के बीच उत्तराधिकार-संघर्ष हुआ, जिसमें अंततः संग्रामसिंह (सांगा) विजयी रहे।
1509-1528 ई.
राणा सांगा — मेवाड़ का शक्ति-शिखर व खानवा
राणा सांगा ने खातोली (1517) व बाड़ी में लोदी को तथा गागरोन में माळवा को पराजित कर मेवाड़ को उत्तर भारत की प्रमुख शक्ति बनाया। 16 मार्च 1527 को खानवा में बाबर से पराजित हुए; 1528 में मृत्यु।
1528-1531 ई.
रत्नसिंह द्वितीय — अल्प व अशांत शासन
सांगा के पुत्र रत्नसिंह द्वितीय का शासन संक्षिप्त व संघर्षपूर्ण रहा; बूँदी के हाड़ा राजा से पारस्परिक द्वंद्व में उनकी मृत्यु हुई।
1531-1536 ई. (जौहर 1535)
विक्रमादित्य — बहादुरशाह आक्रमण व द्वितीय जौहर
दुर्बल शासक विक्रमादित्य के काल में 1535 में गुजरात के बहादुरशाह ने चित्तौड़ पर आक्रमण किया, जिसमें रानी कर्णावती (कर्मावती) के नेतृत्व में द्वितीय जौहर हुआ।
1536-1540 ई.
बनवीर — हड़प व पन्ना धाय का बलिदान
बनवीर ने विक्रमादित्य की हत्या कर सत्ता हड़प ली और शिशु उदयसिंह को मारना चाहा। धाय पन्ना धाय ने अपने पुत्र चंदन का बलिदान देकर उदयसिंह को कुंभलगढ़ पहुँचाकर बचाया।
1540-1572 ई. (जौहर 1568)
उदयसिंह द्वितीय — उदयपुर व तृतीय जौहर
उदयसिंह द्वितीय ने 1540 में बनवीर को पराजित कर सिंहासन प्राप्त किया, 1559 में उदयपुर बसाया। 1567-68 में अकबर के घेरे में जयमल राठौड़ व पत्ता सिसोदिया की वीरता तथा तृतीय जौहर के साथ चित्तौड़ का महत्त्व अमर हुआ; 1572 में उनका देहांत।
मेवाड़ शासक-कालक्रम सारणी (बप्पा रावल → उदयसिंह द्वितीय)
शासकशासनकाल (ई.)वंश/शाखाचित्तौड़ से संबद्ध प्रमुख घटना
बप्पा रावललगभग 728-753गुहिल (संस्थापक)मोरी शासक मान मोरी से चित्तौड़ प्राप्त; गुहिल वंश की स्थापना
जैत्रसिंह (जैत्रसी)लगभग 1213-1252गुहिल (रावल शाखा)1226-27 में इल्तुतमिश के नागदा आक्रमण को विफल किया
रत्नसिंह (रतनसी)लगभग 1302-1303गुहिल (रावल शाखा)1303 अलाउद्दीन खलजी का घेरा; प्रथम जौहर; चित्तौड़ का पतन
हम्मीर सिंहलगभग 1326-1364सिसोदिया (संस्थापक)मालदेव/सोनगरा से चित्तौड़ पुनः प्राप्त; सिसोदिया वंश की स्थापना
क्षेत्रसिंह (खेता)लगभग 1364-1382सिसोदियामेवाड़ का विस्तार; माळवा-दिशा में सैन्य सफलता
राणा लाखा (लक्ष्यसिंह)लगभग 1382-1421सिसोदियाजावर की चाँदी/जस्ता खानें, गंभीरी बांध व पिछोला-कार्य
राणा मोकललगभग 1421-1433सिसोदियासमाधीश्वर मंदिर का जीर्णोद्धार; अल्पायु में हत्या
राणा कुम्भा (कुम्भकर्ण)1433-1468सिसोदिया1440 महमूद खलजी पर विजय; विजय स्तंभ का निर्माण
उदयसिंह प्रथम (उदा)1468-1473सिसोदियापिता कुम्भा की हत्या कर सत्ता; वज्रपात से मृत्यु
राणा रायमल1473-1509सिसोदियामेवाड़ में पुनः स्थिरता; पुत्रों में उत्तराधिकार-संघर्ष
राणा सांगा (संग्रामसिंह)1509-1528सिसोदियाखातोली, बाड़ी व 1527 खानवा; मेवाड़ का शक्ति-शिखर
रत्नसिंह द्वितीय1528-1531सिसोदियाअल्प व अशांत शासन; बूँदी संघर्ष में मृत्यु
विक्रमादित्य1531-1536सिसोदिया1535 बहादुरशाह आक्रमण; द्वितीय जौहर (रानी कर्णावती)
बनवीर (हड़प करने वाला)1536-1540सिसोदिया (शाखा)विक्रमादित्य की हत्या; पन्ना धाय द्वारा उदयसिंह की रक्षा
उदयसिंह द्वितीय1540-1572सिसोदिया1559 उदयपुर स्थापना; 1567-68 अकबर का घेरा व तृतीय जौहर
चित्तौड़ के तीन साके (जौहर) — रिवीजन सारणी
साका/जौहरवर्ष (ई.)आक्रमणकारीमेवाड़ शासकसंबद्ध रानी/वीर
प्रथम1303अलाउद्दीन खलजीरत्नसिंह (रावल)रानी पद्मिनी
द्वितीय1535बहादुरशाह (गुजरात)विक्रमादित्यरानी कर्णावती (कर्मावती)
तृतीय1568अकबरउदयसिंह द्वितीयजयमल राठौड़ व पत्ता सिसोदिया; जौहर — दुर्ग की स्त्रियाँ (नायिका अपुष्ट)
राणा सांगा के प्रमुख युद्ध
युद्धवर्ष (ई.)प्रतिपक्षपरिणाम
खातोली का युद्ध1517इब्राहीम लोदीसांगा विजयी
बाड़ी/धौलपुर का युद्धलगभग 1518-19इब्राहीम लोदीसांगा विजयी
गागरोन का युद्धलगभग 1519महमूद खलजी द्वितीय (माळवा)सांगा विजयी; महमूद बंदी
खानवा का युद्ध16 मार्च 1527बाबरसांगा पराजित
मुख्य तथ्यचित्तौड़ के तीन साके/जौहर याद रखें — 1303 (अलाउद्दीन, पद्मिनी), 1535 (बहादुरशाह, कर्णावती), 1568 (अकबर, जयमल-पत्ता)। यह RAS/EO-RO का सर्वाधिक पूछा जाने वाला बिंदु है।
मुख्य तथ्यरावल शाखा से सिसोदिया शाखा का संक्रमण-बिंदु: 1303 में रावल रत्नसिंह के साथ रावल शाखा का पतन, और लगभग 1326 में हम्मीर सिंह द्वारा चित्तौड़ पुनः प्राप्ति के साथ सिसोदिया वंश की स्थापना।
मुख्य तथ्यविजय स्तंभ राणा कुम्भा द्वारा 1440 में महमूद खलजी (माळवा) पर विजय के उपलक्ष्य में बनवाया गया (निर्माण लगभग 1440-1448) — इसे कीर्ति स्तंभ (जैन, प्राचीन) से न मिलाएँ।
परीक्षा-भ्रमभ्रम-बिंदु: विजय स्तंभ (कुम्भा, हिन्दू/विष्णु-समर्पित, 9 मंज़िला) बनाम कीर्ति स्तंभ (जैन तीर्थंकर आदिनाथ को समर्पित, पूर्ववर्ती व छोटा)। परीक्षा में प्रायः इन्हें आपस में उलझाया जाता है।
परीक्षा-भ्रमभ्रम-बिंदु: 'उदयसिंह प्रथम (उदा)' — कुम्भा का हत्यारा पुत्र, बनाम 'उदयसिंह द्वितीय' — उदयपुर का संस्थापक व महाराणा प्रताप के पिता। दोनों भिन्न व्यक्ति हैं।
परीक्षा-भ्रमभ्रम-बिंदु: द्वितीय जौहर (1535) रानी कर्णावती से, जबकि प्रथम जौहर (1303) रानी पद्मिनी से संबद्ध है — रानियों व वर्षों को न बदलें। साथ ही खानवा 1527 है, पानीपत (प्रथम) 1526 — इन्हें अलग रखें।
स्मरण-सूत्रस्मरण-कथा: पन्ना धाय ने अपने पुत्र चंदन को शिशु उदयसिंह के स्थान पर सुला कर बनवीर की तलवार के आगे रख दिया — मातृत्व से बड़ा स्वामिधर्म। इसी बलिदान से मेवाड़ का भावी वंश (उदयसिंह → प्रताप) बचा।
स्मरण-सूत्रक्रम-स्मरण सूत्र: 'बप्पा से हम्मीर, कुम्भा-सांगा शिखर, बनवीर का छल, उदय का उदय' — यानी बप्पा (स्थापना) → हम्मीर (पुनरुद्धार) → कुम्भा-सांगा (चरम) → बनवीर (हड़प) → उदयसिंह द्वितीय (उदयपुर व नवजीवन)।
⚠ सत्यापन हेतु (4)
  • बप्पा रावल का शासनकाल स्रोतानुसार भिन्न मिलता है (लगभग 728-753 ई. सर्वाधिक प्रचलित; कुछ स्रोत 713-810 ई. देते हैं) — चित्तौड़-प्राप्ति की तिथि लगभग 734 ई. परंपरागत मान्यता है, प्रमाणित नहीं।
  • अनेक मध्यकालीन शासकों (जैत्रसिंह, हम्मीर, क्षेत्रसिंह, लाखा, मोकल) के आरम्भ-अंत वर्षों में स्रोतों में एक-दो वर्ष का अंतर मिलता है; यहाँ सर्वाधिक स्वीकृत लगभग-तिथियाँ दी गई हैं।
  • हम्मीर द्वारा चित्तौड़ पुनः प्राप्ति की तिथि (लगभग 1326 ई.) व प्रतिपक्ष (मालदेव अथवा उसका उत्तराधिकारी जैज़ा) के विवरण में विद्वानों में मतभेद है।
  • तृतीय जौहर की तिथि को कुछ स्रोत 1567 व कुछ 1568 ई. लिखते हैं (घेरा अक्टूबर 1567 से फरवरी 1568 तक चला); दुर्ग-पतन प्रायः फरवरी 1568 माना जाता है।

प्रथम साका

प्रथम जौहर एवं साका (1303 ई.): अलाउद्दीन खिलजी बनाम रावल रतन सिंह — चित्तौड़ का पहला बलिदान

चित्तौड़गढ़ दुर्ग के इतिहास में 1303 ई. का घेरा एक निर्णायक मोड़ है, क्योंकि यह दुर्ग के तीन प्रसिद्ध साकों में प्रथम था। इस समय मेवाड़ पर गुहिल वंश की रावल शाखा के शासक रावल रतन सिंह (रत्नसिंह) का शासन था, जो 1302-03 ई. के लगभग गद्दी पर थे। दूसरी ओर दिल्ली सल्तनत का सिंहासन अलाउद्दीन खिलजी के अधीन था, जो साम्राज्यवादी विस्तार, आर्थिक-सामरिक नियंत्रण तथा राजपूताना के सुदृढ़ दुर्गों पर अधिकार की नीति चला रहा था। रणथम्भौर (1301) पर विजय के पश्चात अलाउद्दीन की दृष्टि मेवाड़ के अजेय माने जाने वाले चित्तौड़ दुर्ग पर पड़ी, जो मालवा-गुजरात मार्ग पर सामरिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण था।

1303 अलाउद्दीन खलजीरानी पद्मिनीगोरा-बादल 1535 बहादुरशाहरानी कर्णावती(गुजरात) 1568 अकबरजौहर (नायिका अपुष्ट)जयमल-पत्ता
तीन साके — तीन आक्रांता। (पद्मिनी व फूल कँवर परंपरा/किंवदंती हैं; कर्णावती ऐतिहासिक।)

इतिहास के समकालीन एवं एकमात्र प्रत्यक्षदर्शी स्रोत अमीर खुसरो हैं, जो स्वयं अलाउद्दीन के साथ इस अभियान में उपस्थित थे। उन्होंने अपनी रचना 'खजाइन-उल-फुतूह' (जिसे 'तारीख-ए-अलाई' भी कहते हैं) में इस घेरे का वर्णन किया है। खुसरो के अनुसार अभियान लगभग जनवरी 1303 में आरंभ हुआ और लंबे घेरे के पश्चात 26 अगस्त 1303 को दुर्ग विजित हुआ। खुसरो ने दुर्ग-विजय के बाद हुए भीषण नरसंहार का उल्लेख किया है, परंतु ध्यातव्य है कि खुसरो ने रानी पद्मिनी का कोई उल्लेख नहीं किया — यही परीक्षा की दृष्टि से सबसे बड़ा तथ्य है। पद्मिनी की कथा साहित्यिक-किंवदंती है, ऐतिहासिक अभिलेख नहीं।

पद्मिनी-वृत्तांत का सर्वप्रथम स्रोत मलिक मुहम्मद जायसी का 'पद्मावत' (रचनाकाल लगभग 1540 ई.) है, जो अवधी भाषा में रचित एक सूफी प्रेमाख्यानक/रूपक काव्य है। घेरे की घटना के लगभग 237 वर्ष बाद रचित यह काव्य रूपकात्मक है, जिसमें रतन सिंह को 'मन', पद्मिनी को 'बुद्धि', अलाउद्दीन को 'माया' और तोता (हीरामन) को 'गुरु' का प्रतीक बताया गया है। जायसी की कथा के अनुसार रतन सिंह के दरबार से निष्कासित ब्राह्मण राघव चेतन ने रुष्ट होकर दिल्ली जाकर अलाउद्दीन को पद्मिनी के अलौकिक सौंदर्य का वर्णन सुनाया, जिससे प्रेरित होकर अलाउद्दीन ने चित्तौड़ पर आक्रमण किया।

जायसी की किंवदंती में कूटनीति और वीरता का रोचक प्रसंग है: अलाउद्दीन ने दर्पण/जल में पद्मिनी की केवल छाया देखने की शर्त पर संधि की, फिर छल से रतन सिंह को बंदी बनाकर दिल्ली ले गया। इस पर पद्मिनी की चतुराई से गोरा और बादल नामक दो वीर राजपूत योद्धाओं ने योजना बनाई — 700 पालकियों में सैनिकों को छिपाकर, यह बहाना बनाकर कि इनमें पद्मिनी व उसकी दासियाँ आ रही हैं, वे दिल्ली पहुँचे और रतन सिंह को छुड़ा लाए। इस संघर्ष में वृद्ध गोरा वीरगति को प्राप्त हुआ, जबकि बालक बादल रतन सिंह को सुरक्षित चित्तौड़ ले आया। यहाँ गोरा को बादल का चाचा (काका) बताया गया है।

घटनाक्रम की परिणति में जब दुर्ग की रक्षा असंभव हो गई, तो राजपूत परंपरा के अनुसार साका हुआ — पुरुष योद्धाओं ने केसरिया वस्त्र धारण कर अंतिम युद्ध में प्राण न्योछावर किए, और स्त्रियों ने सम्मान-रक्षा हेतु अग्नि में प्रवेश कर जौहर किया। किंवदंती के अनुसार इस प्रथम जौहर का नेतृत्व रानी पद्मिनी ने किया। विजय के पश्चात अलाउद्दीन ने चित्तौड़ का नाम अपने पुत्र खिज्र खाँ के नाम पर 'खिज्राबाद' रखा और शासन-भार खिज्र खाँ को सौंपा। यही 1303 का प्रथम साका था, जिसने चित्तौड़ को बलिदान और आत्म-सम्मान का प्रतीक बना दिया।

पद्मिनी महल एवं कमल-तालाब।
पद्मिनी महल एवं कमल-तालाब।स्रोत: Wikimedia Commons · CC BY-SA 3.0
प्रथम साका 1303 — मूल तथ्य एक दृष्टि में
तथ्यविवरण
वर्ष / तिथि1303 ई. (घेरा जन. 1303 — दुर्ग-पतन 26 अगस्त 1303)
आक्रमणकारीअलाउद्दीन खिलजी (दिल्ली सल्तनत, खिलजी वंश)
मेवाड़ शासकरावल रतन सिंह (रत्नसिंह) — गुहिल/रावल शाखा
रानीरानी पद्मिनी (पद्मावती) — किंवदंती अनुसार
प्रमुख वीरगोरा एवं बादल (चाचा-भतीजा)
समकालीन प्रत्यक्षदर्शी स्रोतअमीर खुसरो — 'खजाइन-उल-फुतूह' / 'तारीख-ए-अलाई'
पद्मिनी-कथा का स्रोतमलिक मुहम्मद जायसी कृत 'पद्मावत' (लगभग 1540 ई., अवधी)
षड्यंत्रकारी पात्रराघव चेतन (निष्कासित ब्राह्मण) — जायसी अनुसार
परिणामसाका (पुरुषों का अंतिम युद्ध) + जौहर (स्त्रियों का अग्नि-प्रवेश)
दुर्ग का नया नामखिज्राबाद (पुत्र खिज्र खाँ के नाम पर)
नया शासकखिज्र खाँ (अलाउद्दीन का पुत्र)
पद्मावत (जायसी) के प्रमुख रूपक/प्रतीक
पात्ररूपक (प्रतीक)
रतन सिंहमन
पद्मिनीबुद्धि / विवेक
अलाउद्दीनमाया
हीरामन तोतागुरु
राघव चेतनशैतान / मायावी
चित्तौड़ के तीन साके — तुलनात्मक (परीक्षा-दृष्टि)
साकावर्षआक्रमणकारीमेवाड़ शासकजौहर-नेतृत्व
प्रथम1303अलाउद्दीन खिलजीरावल रतन सिंहरानी पद्मिनी (किंवदंती)
द्वितीय1535बहादुर शाह (गुजरात)विक्रमादित्य (नाबालिग)रानी कर्णावती
तृतीय1568अकबरउदय सिंह (अनुपस्थित); जयमल-पत्ता रक्षकजौहर — राजपूत स्त्रियाँ (नाम अपुष्ट)
मुख्य तथ्यसबसे महत्वपूर्ण तथ्य — समकालीन प्रत्यक्षदर्शी अमीर खुसरो ने अपनी 'खजाइन-उल-फुतूह' में चित्तौड़-विजय का वर्णन किया परंतु रानी पद्मिनी का कोई उल्लेख नहीं किया। पद्मिनी का प्रथम उल्लेख 237 वर्ष बाद जायसी के 'पद्मावत' (1540 ई.) में मिलता है।
मुख्य तथ्यविजय के बाद अलाउद्दीन ने चित्तौड़ का नाम 'खिज्राबाद' रखकर शासन अपने पुत्र खिज्र खाँ को सौंपा।
परीक्षा-भ्रमभ्रम से बचें — किंवदंती (जायसी/टॉड परंपरा) के अनुसार गोरा और बादल 'भाई' नहीं, अपितु गोरा (वृद्ध) बादल (बालक) के चाचा/काका माने जाते हैं (यह पूरा प्रसंग ऐतिहासिक रूप से अप्रमाणित किंवदंती है)। साथ ही तीनों साकों की रानियों को न मिलाएँ: 1303-पद्मिनी, 1535-कर्णावती, 1568-जौहर (नायिका स्रोतों में अपुष्ट)।
परीक्षा-भ्रम'साका' और 'जौहर' पर्यायवाची नहीं हैं — जौहर स्त्रियों का अग्नि-प्रवेश है, जबकि साका पुरुष योद्धाओं का केसरिया धारण कर अंतिम प्राणपण युद्ध है; दोनों मिलकर पूर्ण बलिदान बनाते हैं।
स्मरण-सूत्रस्मरण-सूत्र 'रा-रा-प-गो-बा': रावल रतन सिंह बनाम अलाउद्दीन, रानी पद्मिनी, और गोरा-बादल की 700 पालकियों वाली छल-रणनीति — यही 1303 की पूरी कथा की धुरी है।
स्मरण-सूत्र'खजाना खोजने खुसरो आया, पर पद्मिनी न पाया' — याद रखें कि खजाइन (खजाना) लिखने वाला खुसरो घेरे में मौजूद था फिर भी उसके ग्रंथ में पद्मिनी अनुपस्थित है।
⚠ सत्यापन हेतु (4)
  • रानी पद्मिनी की ऐतिहासिकता विवादास्पद है — अनेक इतिहासकार उन्हें साहित्यिक/किंवदंती पात्र मानते हैं, ऐतिहासिक व्यक्तित्व नहीं; उनका प्रथम उल्लेख जायसी के पद्मावत (1540) में ही मिलता है।
  • राघव चेतन द्वारा अलाउद्दीन को उकसाने, दर्पण में पद्मिनी की छाया दिखाने, तथा 700 पालकियों वाली गोरा-बादल की रणनीति — ये सभी प्रसंग जायसी की साहित्यिक परंपरा से हैं, समकालीन ऐतिहासिक अभिलेखों से प्रमाणित नहीं।
  • 'खिज्राबाद' नामकरण एवं खिज्र खाँ को शासन सौंपने का उल्लेख परवर्ती फारसी स्रोतों में मिलता है; तिथि 26 अगस्त 1303 खुसरो-आधारित मानी जाती है पर अलग-अलग स्रोतों में थोड़ा अंतर संभव है।
  • रावल रतन सिंह के शासनकाल की सटीक तिथियाँ (लगभग 1302-1303) स्रोतों के अनुसार भिन्न हो सकती हैं।

द्वितीय साका

चित्तौड़गढ़ का द्वितीय साका (1535 ई.): बहादुर शाह का आक्रमण, रानी कर्णावती का जौहर और राखी की कथा

चित्तौड़गढ़ दुर्ग के इतिहास में जो तीन 'साके' (सामूहिक बलिदान — पुरुषों का केसरिया और स्त्रियों का जौहर) प्रसिद्ध हैं, उनमें द्वितीय साका 1535 ई. में गुजरात के सुल्तान बहादुर शाह के आक्रमण के समय हुआ। यह घटना राणा सांगा (महाराणा संग्राम सिंह) की मृत्यु (1528, खानवा के बाद 1528 ई. में) के कुछ ही वर्षों बाद घटी, जब मेवाड़ नेतृत्व-शून्यता और आंतरिक फूट से जूझ रहा था। इस समय मेवाड़ का शासक सांगा का पुत्र विक्रमादित्य (विक्रमादित्य सिंह) था, जो अल्पवयस्क, उद्दंड और सरदारों में अलोकप्रिय था; उसके अशिष्ट व्यवहार से मेवाड़ के अनेक प्रमुख सामंत रुष्ट होकर अलग हो गए थे। इस राजनीतिक दुर्बलता ने ही बहादुर शाह को चित्तौड़ पर आक्रमण का अवसर दिया।

वास्तव में बहादुर शाह ने दो बार आक्रमण किया। पहला आक्रमण 1532-33 ई. में हुआ (घेरा दिसंबर 1532 में आरंभ, मार्च 1533 में संधि), जिसे राणा सांगा की विधवा एवं विक्रमादित्य की माता रानी कर्णावती (कर्मावती) ने कूटनीति से टाल दिया — कहा जाता है कि उसने संधि कर धन/क्षेत्र देकर सुल्तान को लौटा दिया। किंतु 1535 ई. में बहादुर शाह पुनः विशाल सेना और सुसज्जित तोपखाने के साथ लौटा। इस दूसरे घेरे में निर्णायक भूमिका उसके तोपखाने की रही, जिसका प्रमुख रूमी खान नामक एक तुर्क (उस्मानी/रूमी) गोलंदाज़ था। रूमी खान ने दुर्ग की प्राचीरों के नीचे बारूदी सुरंगें (नकब) लगाकर बुर्जों को उड़ा दिया — इसी एक विस्फोट में सैकड़ों रक्षक मारे गए। यह भारतीय इतिहास में बारूद व तोपखाने की बढ़ती निर्णायक शक्ति का उदाहरण माना जाता है, जहाँ चित्तौड़ जैसा अभेद्य दुर्ग भी आधुनिक गोलंदाज़ी के आगे टिक न सका।

जब पराजय निश्चित हो गई, तब मेवाड़ की परंपरा के अनुसार दुर्ग में जौहर और साका हुआ। रानी कर्णावती के नेतृत्व में लगभग 13,000 वीरांगनाओं ने अग्निकुंड में प्रवेश कर जौहर किया (यह संख्या परंपरागत/अनुमानित है)। इसके पश्चात केसरिया वस्त्र धारण कर राजपूत योद्धा दुर्ग-द्वार खोलकर शत्रु पर टूट पड़े और वीरगति को प्राप्त हुए। इस साके की एक विशेष बात यह रही कि रानी कर्णावती ने भविष्य की रक्षा हेतु दोनों राजकुमारों — विक्रमादित्य और उदयसिंह (जो आगे चलकर महाराणा प्रताप के पिता बने) — को घेरे से पूर्व बूँदी भेज दिया, ताकि मेवाड़ का वंश और गद्दी सुरक्षित रहे।

इस साके से जुड़ी सर्वाधिक प्रसिद्ध किंवदंती 'राखी की कथा' है। परंपरा के अनुसार, संकट के समय रानी कर्णावती ने मुगल सम्राट हुमायूँ को राखी भेजकर भाई मानते हुए सहायता माँगी। कहा जाता है कि हुमायूँ ने राखी का सम्मान करते हुए मेवाड़ की ओर कूच किया, किंतु वह तब पहुँचा जब चित्तौड़ में जौहर हो चुका था; अतः उसने बहादुर शाह का पीछा कर उसे मांडू/गुजरात की ओर खदेड़ा और बाद में विक्रमादित्य को मेवाड़ का शासन लौटाया। यह कथा कर्नल जेम्स टॉड ने लोकप्रिय की; अनेक आधुनिक इतिहासकार इसकी ऐतिहासिकता (विशेषतः राखी भेजने के तथ्य) को संदिग्ध मानते हैं, फिर भी यह राजस्थान की सांस्कृतिक स्मृति और परीक्षाओं में स्थायी रूप से जुड़ी है।

रक्षा-पक्ष की दृष्टि से इस साके में हाड़ा राजपूतों की भूमिका उल्लेखनीय रही। रानी कर्णावती स्वयं बूँदी के हाड़ा राजवंश की राजकुमारी (बूँदी के राव नरबद की पुत्री मानी जाती है) थीं, अतः उनके ननिहाल-पक्ष के हाड़ा सरदार उनकी सहायता को आए। स्रोतों में देवला के बाघ सिंह (सिसोदिया) सरदार का इस साके में वीरगति पाने का उल्लेख मिलता है ('देवला के बाघ सिंह' का प्रचलित उल्लेख भ्रामक है)। समग्रतः द्वितीय साका न केवल बलिदान की गाथा है, बल्कि यह मेवाड़ की आंतरिक फूट, तोपखाने-आधारित युद्ध की नई निर्णायकता और राजपूत-मुगल संबंधों के प्रारंभिक स्वरूप को समझने की दृष्टि से RAS/EO-RO स्तर पर अत्यंत महत्वपूर्ण है।

द्वितीय साका — एक नज़र में (रिवीजन तालिका)
तथ्यविवरण
वर्ष1535 ई. (जौहर सामान्यतः 8 मार्च 1535 को माना जाता है)
क्रमचित्तौड़ का द्वितीय साका
आक्रमणकारीगुजरात का सुल्तान बहादुर शाह
मेवाड़ शासकविक्रमादित्य (राणा सांगा का पुत्र, अल्पवयस्क/अलोकप्रिय)
रक्षा नेतृत्वरानी कर्णावती (कर्मावती), सांगा की विधवा
जौहररानी कर्णावती सहित लगभग 13,000 वीरांगनाएँ
तोपखाना प्रमुखरूमी खान — तुर्क/रूमी गोलंदाज़; बारूदी सुरंगों से बुर्ज उड़ाए
प्रसिद्ध कथारानी कर्णावती द्वारा हुमायूँ को राखी भेजना (परंपरा)
राजकुमारों की रक्षाविक्रमादित्य व उदयसिंह घेरे से पूर्व बूँदी भेजे गए
हाड़ा योगदानदेवला के बाघ सिंह (सिसोदिया) का बलिदान
प्रमुख पात्र एवं उनकी भूमिका
पात्रभूमिका/महत्व
बहादुर शाहगुजरात सुल्तान; 1532-33 व 1535 में चित्तौड़ पर आक्रमण; बाद में हुमायूँ से पराजित
रानी कर्णावतीराणा सांगा की रानी; दुर्ग-रक्षा का नेतृत्व; जौहर की अगुवा
विक्रमादित्यतत्कालीन मेवाड़ शासक; बूँदी भेजा गया; बाद में गद्दी लौटाई गई
उदयसिंहसांगा का छोटा पुत्र; सुरक्षार्थ बूँदी भेजा गया; आगे उदयपुर-संस्थापक व प्रताप के पिता
रूमी खानबहादुर शाह का गोलंदाज़; तोपखाने/सुरंगों से दुर्ग-भंग; बाद में हुमायूँ की सेवा में गया
हुमायूँमुगल सम्राट; राखी-कथा से जुड़ा; बहादुर शाह को खदेड़ा
देवला के बाघ सिंहरक्षक सरदार; साके में वीरगति
चित्तौड़ के तीनों साकों की तुलना (भ्रम-निवारण हेतु)
साकावर्षआक्रमणकारीमेवाड़ शासकजौहर नेतृत्व
प्रथम1303 ई.अलाउद्दीन खिलजीरावल रतनसिंहरानी पद्मिनी
द्वितीय1535 ई.बहादुर शाह (गुजरात)विक्रमादित्यरानी कर्णावती
तृतीय1568 ई.अकबरउदयसिंह (नेतृत्व जयमल-पत्ता)जौहर — दुर्ग की स्त्रियाँ (नाम अपुष्ट)
मुख्य तथ्यद्वितीय साका = 1535 ई., बहादुर शाह बनाम विक्रमादित्य, जौहर-नेतृत्व रानी कर्णावती (~13,000), तोपखाना प्रमुख रूमी खान। ये चार तथ्य परीक्षा-केंद्र हैं।
परीक्षा-भ्रमभ्रम से बचें: शासक विक्रमादित्य था, पर रक्षा-नेतृत्व रानी कर्णावती ने किया — प्रश्न में 'शासक' और 'जौहर करने वाली रानी' अलग-अलग व्यक्ति हैं। साथ ही तीनों साकों की जोड़ी न उलझाएँ: 1303-पद्मिनी-खिलजी, 1535-कर्णावती-बहादुर शाह, 1568-अकबर-जयमल/पत्ता।
परीक्षा-भ्रमराखी की कथा परंपरा/किंवदंती है (कर्नल टॉड द्वारा लोकप्रिय); कई इतिहासकार इसे संदिग्ध मानते हैं। परीक्षा में 'परंपरा के अनुसार' के रूप में स्वीकार्य, पर सिद्ध ऐतिहासिक तथ्य न मानें।
मुख्य तथ्यरूमी खान का तोपखाना निर्णायक रहा — बारूदी सुरंगों ने बुर्ज उड़ाए। यह भारतीय दुर्ग-युद्ध में तोपखाने की बढ़ती निर्णायकता का उदाहरण है।
स्मरण-सूत्रस्मरण-सूत्र '1-2-3': 1303-1535-1568 तीन साके; बीच वाले (द्वितीय) में 'क' से कर्णावती और 'ब' से बहादुर शाह — 'कर्णावती का बलिदान बहादुर शाह के विरुद्ध'। और राजकुमार बूँदी भेजे गए = वंश बचा, इसलिए उदयसिंह जीवित रहे और आगे प्रताप-वंश चला।
⚠ सत्यापन हेतु (5)
  • जौहर की सटीक तिथि (सामान्यतः 8 मार्च 1535 उद्धृत) तथा जौहर में 13,000 की संख्या परंपरागत/अनुमानित है; स्रोतों में भिन्नता संभव।
  • 'बागोर के हाड़ा' सरदार का ठीक-ठीक व्यक्तिगत नाम पूर्ण विश्वास से नहीं दिया जा सका; हाड़ा राजपूतों की रक्षा में भागीदारी परंपरा में प्रतिष्ठित है (रानी कर्णावती स्वयं बूँदी के हाड़ा वंश से थीं)।
  • राखी भेजने की कथा की ऐतिहासिकता विवादित है; हुमायूँ के देर से पहुँचने और बहादुर शाह को खदेड़ने का घटनाक्रम अपेक्षाकृत अधिक स्वीकृत है, पर 'राखी' प्रसंग को अनेक इतिहासकार परवर्ती किंवदंती मानते हैं।
  • रानी कर्णावती के पिता का नाम (बूँदी के राव नरबद) कुछ स्रोतों पर आधारित है; विवरण में मामूली भिन्नता संभव।
  • द्वितीय साका के हाड़ा/रक्षक सरदार का नाम व रूमी खान का मूल नाम — स्रोतानुसार भिन्न; 'बागोर के हाड़ा' व 'ख्वाजा सफर' अपुष्ट।

तृतीय साका

चित्तौड़गढ़ दुर्ग का तृतीय साका (1568): अकबर बनाम उदयसिंह द्वितीय — जयमल-पत्ता का बलिदान, जौहर एवं उदयपुर की स्थापना

चित्तौड़गढ़ के इतिहास में सन् 1567-68 का घेरा 'तृतीय साका' के रूप में स्मरण किया जाता है और यह तीनों साकों में सर्वाधिक व्यापक तथा रक्तरंजित माना जाता है। इस समय मेवाड़ के शासक महाराणा उदयसिंह द्वितीय (राणा साँगा के पुत्र) थे। सन् 1567 में मुग़ल सम्राट अकबर ने चित्तौड़ पर आक्रमण किया। इसके पीछे राजनीतिक कारण थे — अकबर मेवाड़ की स्वतंत्र सत्ता को कुचलकर राजपूताना के मध्य में अपनी धाक जमाना चाहता था, चित्तौड़ का सामरिक-प्रतीकात्मक महत्व तोड़ना चाहता था, और उदयसिंह द्वारा अकबर के विरोधियों (जैसे बाज़ बहादुर तथा माळवा के शरणार्थियों) को संरक्षण देने से भी वह क्रुद्ध था। परंपरागत मान्यता के अनुसार अकबर ने अक्टूबर 1567 (लगभग 20-23 अक्टूबर) में दुर्ग को घेरा और यह घेरा लगभग चार माह चला।

घेरे से पूर्व ही महाराणा उदयसिंह ने सामंतों की सलाह पर दुर्ग की रक्षा का भार अपने दो वीर सेनानायकों — जयमल राठौड़ (मेड़ता) तथा पत्ता (फत्ता) सिसोदिया (कैलवा/केलवा) — को सौंपकर स्वयं पहाड़ियों की ओर चले गए। उदयसिंह का दुर्ग छोड़ जाना बाद में विवाद और आलोचना का विषय बना, परंतु राजनीतिक दृष्टि से इसने मेवाड़ के शासक-वंश और भावी नेतृत्व (महाराणा प्रताप) को सुरक्षित रखा। अकबर ने दुर्ग की मोटी दीवारों को भेदने के लिए 'साबात' (ढकी हुई सुरंग-नुमा अग्रगामी खाई) बनवाई तथा भारी तोपों व बारूदी सुरंगों का प्रयोग किया। घेरे के दौरान जयमल राठौड़ रात्रि में दीवार की मरम्मत का निरीक्षण कर रहे थे, तभी अकबर ने अपनी प्रसिद्ध बंदूक 'संग्राम' से चलाई गई गोली से उन्हें घायल/मृत कर दिया (22-23 फरवरी 1568 की रात)।

जयमल के आहत होने पर रक्षा का नेतृत्व मात्र सोलह वर्षीय पत्ता (फत्ता) सिसोदिया ने सँभाला। परंपरा के अनुसार पत्ता की माता ने उसे कवच पहनाकर, स्वयं तथा पत्ता की नवविवाहिता पत्नी को शस्त्र देकर रणभूमि में उतारा। जब पुरुषों ने 'केसरिया' (साका) धारण कर अंतिम युद्ध का निश्चय किया, तब दुर्ग की स्त्रियों ने जौहर किया (अकबरनामा के अनुसार 22 फरवरी 1568 की रात दुर्ग के विभिन्न घरों में अनेक राजपूत स्त्रियों ने जौहर किया — इनमें पत्ता की माता का उल्लेख मिलता है। प्रचलित 'रानी फूल कँवर' नाम समकालीन स्रोतों में नहीं मिलता, और चूँकि शासक उदयसिंह दुर्ग छोड़ चुके थे, कोई 'चित्तौड़ की रानी' इसकी नायिका नहीं थी) — यह चित्तौड़ का तृतीय (और अंतिम) जौहर था। 23 फरवरी 1568 को चित्तौड़ पतित हुआ। विजय के पश्चात अकबर ने प्रतिशोध में लगभग 30,000 निवासियों का संहार करवाया (अबुल फ़ज़ल के 'अकबरनामा' के अनुसार)। किंतु जयमल और पत्ता की वीरता से अकबर इतना प्रभावित हुआ कि उसने आगरा दुर्ग के द्वार पर दोनों वीरों की हाथी पर आरूढ़ पाषाण-प्रतिमाएँ स्थापित करवाईं — यह पराजित शत्रु के शौर्य को दिया गया अद्वितीय सम्मान था।

तृतीय साका को पूर्ण रूप से समझने हेतु उदयसिंह के बाल्यकाल का 'पन्ना धाय प्रसंग' अनिवार्य पृष्ठभूमि है। राणा साँगा की मृत्यु के बाद मेवाड़ में सत्ता-संघर्ष चला। साँगा के भाई पृथ्वीराज के अवैध पुत्र बनवीर ने सन् 1536 के आसपास साँगा के पुत्र विक्रमादित्य की हत्या कर सत्ता हथिया ली और शिशु उदयसिंह को भी मार डालना चाहा। उदयसिंह की धाय (दाई) पन्ना धाय ने अपने ही पुत्र चंदन को राजकुमार की शय्या पर सुला दिया; बनवीर ने उसे ही उदयसिंह समझकर मार डाला। पन्ना धाय ने उदयसिंह को थाली/टोकरी में छिपाकर दुर्ग से बाहर निकाला और कुम्भलगढ़ के कोटवाल आशा शाह (आशा देपुरा) के संरक्षण में पहुँचाया। पुत्र-बलिदान की यह गाथा राजपूत स्वामिभक्ति का उच्चतम उदाहरण मानी जाती है। कालांतर में सन् 1540 में उदयसिंह ने बनवीर को पराजित कर मेवाड़ का सिंहासन पुनः प्राप्त किया।

चित्तौड़ की भौगोलिक असुरक्षा तथा भावी मुग़ल आक्रमणों को ध्यान में रखते हुए उदयसिंह ने पिछोला झील के निकट अरावली की सुरक्षित घाटी में एक नई राजधानी बसाई — उदयपुर। प्रचलित मान्यता के अनुसार 1559 ई. में उदयपुर नगर की नींव रखी गई (उदयसागर झील का निर्माण भी इसी काल 1559-1565 में हुआ); कहा जाता है कि एक साधु/तपस्वी के आशीर्वाद व परामर्श पर उदयसिंह ने यह स्थल चुना। 1568 में चित्तौड़ के पतन के बाद उदयपुर व्यावहारिक रूप से मेवाड़ की राजधानी बन गया। इस प्रकार चित्तौड़ का तृतीय साका एक युग का अंत और उदयपुर-केन्द्रित मेवाड़ के नए संघर्ष-युग (जो आगे हल्दीघाटी 1576 तक पहुँचा) का आरंभ था।

जयमल एवं पत्ता — अकबर द्वारा आगरा दुर्ग में स्थापित प्रतिमाएँ।
जयमल एवं पत्ता — अकबर द्वारा आगरा दुर्ग में स्थापित प्रतिमाएँ।स्रोत: Wikimedia Commons · Public domain
तृतीय साका (1567-68) — आधारभूत तथ्य (रिवीजन)
तथ्यविवरण
शासक (मेवाड़)महाराणा उदयसिंह द्वितीय (राणा साँगा के पुत्र)
आक्रमणकारीमुग़ल सम्राट अकबर
घेरा आरंभअक्टूबर 1567 (लगभग 20-23 अक्टूबर)
घेरे की अवधिलगभग 4 माह
दुर्ग का पतन23 फरवरी 1568
रक्षा का नेतृत्वजयमल राठौड़ (मेड़ता) व पत्ता/फत्ता सिसोदिया (कैलवा)
जौहर22 फरवरी 1568 की रात दुर्ग की अनेक राजपूत स्त्रियाँ (विभिन्न घरों में); कोई एकल नामित नायिका स्रोत-सम्मत नहीं
अकबर की तकनीकसाबात (ढकी खाई), बारूदी सुरंगें, भारी तोपें, 'संग्राम' बंदूक
जयमल की मृत्युअकबर की बंदूक 'संग्राम' की गोली से (22-23 फरवरी की रात)
पतन के बाद संहारलगभग 30,000 निवासियों की हत्या (अकबरनामा)
अकबर का सम्मानआगरा दुर्ग द्वार पर जयमल-पत्ता की हाथी-आरूढ़ पाषाण प्रतिमाएँ
परिणामउदयपुर मेवाड़ की व्यावहारिक राजधानी बना
प्रमुख पात्र एवं उनकी भूमिका
पात्रपरिचयभूमिका / अंत
उदयसिंह द्वितीयमेवाड़ शासक, प्रताप के पितासामंतों की सलाह पर दुर्ग छोड़ा; वंश व नेतृत्व सुरक्षित रखा
जयमल राठौड़मेड़ता का राठौड़ वीर (वीरमदेव का पुत्र)मुख्य सेनानायक; अकबर की गोली से मारे गए
पत्ता (फत्ता) सिसोदियाकैलवा का सिसोदिया, आयु ~16 वर्षजयमल के बाद नेतृत्व; युद्ध में वीरगति
पत्ता की मातासिसोदिया वीरांगनापत्ता को कवच पहनाया, स्वयं व पुत्रवधू को शस्त्र देकर लड़ीं
जौहर करने वाली स्त्रियाँदुर्ग की अनेक राजपूत वीरांगनाएँ22 फरवरी 1568 की रात विभिन्न घरों में जौहर; कोई एकल नामित 'रानी' स्रोत-सम्मत नहीं
अबुल फ़ज़लअकबर का दरबारी इतिहासकार'अकबरनामा' में घेरे व संहार का वर्णन
चित्तौड़ के तीनों साके — तुलनात्मक (भ्रम-निवारण)
साकावर्षआक्रमणकारीजौहर-नायिका
प्रथम साका1303 ई.अलाउद्दीन खिलजीरानी पद्मिनी (पद्मावती)
द्वितीय साका1535 ई.बहादुरशाह (गुजरात)रानी कर्णावती (कर्मावती)
तृतीय साका1568 ई.अकबरजौहर — दुर्ग की स्त्रियाँ (नाम अपुष्ट)
पन्ना धाय प्रसंग — घटनाक्रम (पृष्ठभूमि)
क्रमघटना
1राणा साँगा की मृत्यु के बाद मेवाड़ में सत्ता-संघर्ष
2बनवीर (पृथ्वीराज का अवैध पुत्र) ने ~1536 में विक्रमादित्य की हत्या की
3बनवीर ने शिशु उदयसिंह को मारना चाहा
4पन्ना धाय ने अपने पुत्र चंदन को राजकुमार की शय्या पर सुलाया
5बनवीर ने चंदन को उदयसिंह समझकर मार डाला
6पन्ना धाय ने उदयसिंह को कुम्भलगढ़ पहुँचाया (कोटवाल आशा शाह/आशा देपुरा के संरक्षण में)
71540 ई. में उदयसिंह ने बनवीर को हराकर मेवाड़ का सिंहासन पुनः पाया
उदयपुर की स्थापना — तथ्य
तथ्यविवरण
संस्थापकमहाराणा उदयसिंह द्वितीय
स्थापना वर्षप्रचलित मत: 1559 ई.
स्थलपिछोला झील के निकट, अरावली की घाटी
उदयसागर झीलनिर्माण ~1559-1565 ई.
प्रेरणा (किंवदंती)एक साधु/तपस्वी के परामर्श व आशीर्वाद से स्थल चयन
राजधानी बनना1568 में चित्तौड़ पतन के बाद व्यावहारिक राजधानी
मुख्य तथ्यतृतीय साका 1568 चित्तौड़ के तीनों साकों में सर्वाधिक व्यापक; इसी में जौहर (स्त्रियाँ) व साका (पुरुष) दोनों हुए।
मुख्य तथ्यजयमल राठौड़ = मेड़ता का राठौड़; पत्ता (फत्ता) = कैलवा का सिसोदिया — दोनों उदयसिंह के सेनानायक थे।
मुख्य तथ्यअकबर ने आगरा दुर्ग द्वार पर जयमल-पत्ता की हाथी-आरूढ़ पाषाण प्रतिमाएँ लगवाकर पराजित शत्रु के शौर्य को सम्मान दिया।
परीक्षा-भ्रमभ्रम: तृतीय साके की जौहर-नायिका के रूप में प्रचलित 'फूल कँवर' नाम समकालीन स्रोतों में नहीं मिलता — इसे तथ्य न मानें। पद्मिनी (1303, स्वयं किंवदंती) व कर्णावती (1535) से भी न मिलाएँ।
परीक्षा-भ्रमभ्रम: उदयपुर की स्थापना 1559 में हुई, जबकि यह 1568 (चित्तौड़ पतन) के बाद राजधानी बना — दोनों तिथियों को अलग रखें।
परीक्षा-भ्रमभ्रम: पन्ना धाय के पुत्र का नाम चंदन था, जिसे बनवीर ने उदयसिंह समझकर मारा — बनवीर उदयसिंह का 'हत्यारा' नहीं, बल्कि विक्रमादित्य का हत्यारा व चंदन का हत्यारा है।
परीक्षा-भ्रमभ्रम: जयमल को अकबर की बंदूक 'संग्राम' की गोली लगी — तोप या तलवार नहीं। हल्दीघाटी (1576) इससे भिन्न व बाद की घटना है।
स्मरण-सूत्रस्मरण-सूत्र 'जय-पत्ता': जयमल (अकबर की बंदूक 'संग्राम' से), पत्ता (16 वर्षीय नायक), तथा उसी रात (22 फरवरी 1568) दुर्ग की स्त्रियों का जौहर — इन्हीं से पूरा तृतीय साका याद।
स्मरण-सूत्रपन्ना धाय ने पुत्र चंदन को बलिदान कर स्वामी-पुत्र उदयसिंह को बचाया — 'दूध का कर्ज़ खून से चुकाया' — मेवाड़ी स्वामिभक्ति की सर्वोच्च गाथा।
⚠ सत्यापन हेतु (6)
  • पत्ता (फत्ता) सिसोदिया की आयु परंपरागत रूप से ~16 वर्ष बताई जाती है; स्रोतों में यह भिन्न मिल सकती है।
  • जयमल को गोली लगने तथा दुर्ग-पतन की सटीक तिथि (22-23 फरवरी बनाम 25 फरवरी 1568) स्रोतों में थोड़ी भिन्न है।
  • उदयपुर की स्थापना वर्ष पर मतभेद है — 1553, 1559 व 1568 सभी उल्लिखित मिलते हैं; सर्वाधिक प्रचलित 1559 दिया गया है।
  • जौहर करने वाली स्त्रियों तथा साका में मारे गए राजपूतों की संख्या के आँकड़े अनुमानित/परंपरागत हैं।
  • पन्ना धाय द्वारा बनवीर का सत्ता-हरण व विक्रमादित्य की हत्या का वर्ष (1536-1537) स्रोतों में थोड़ा भिन्न मिलता है।
  • तृतीय साके के जौहर में प्रचलित 'रानी फूल कँवर' नाम लोक-परंपरा/कुछ GK पुस्तकों में मिलता है, किंतु समकालीन अभिलेखीय स्रोतों में इसकी पुष्टि नहीं; स्रोत केवल 'विभिन्न घरों की राजपूत स्त्रियों' (पत्ता की माता सहित) का उल्लेख करते हैं।

स्तंभ

विजय स्तंभ एवं कीर्ति स्तंभ — चित्तौड़गढ़ दुर्ग के दो स्तंभ (विस्तृत अध्ययन)

चित्तौड़गढ़ दुर्ग के भीतर स्थित दो कीर्ति-स्तंभ राजस्थानी वास्तुकला और मध्यकालीन इतिहास के अनुपम प्रतीक हैं — विजय स्तंभ (जय स्तंभ) और कीर्ति स्तंभ। दोनों में मूलभूत अंतर धार्मिक व कालगत है: विजय स्तंभ 15वीं शताब्दी का हिंदू (वैष्णव) स्मारक है जिसे मेवाड़ के राणा कुम्भा ने अपनी सैन्य विजय के उपलक्ष्य में बनवाया, जबकि कीर्ति स्तंभ इससे लगभग तीन शताब्दी पूर्व 12वीं शताब्दी का दिगंबर जैन स्मारक है जिसे एक धनाढ्य जैन व्यापारी ने प्रथम तीर्थंकर आदिनाथ को समर्पित किया। परीक्षा की दृष्टि से इन दोनों के निर्माता, कालखंड, ऊँचाई, मंजिलों की संख्या तथा समर्पित देवता को अलग-अलग स्पष्ट रूप से याद रखना अनिवार्य है, क्योंकि RPSC व RAS प्रश्नों में इन्हें आपस में उलझाकर पूछा जाता है।

विजय स्तंभ का निर्माण मेवाड़ के प्रतापी शासक राणा कुम्भा (शासनकाल 1433–1468) ने माळवा के सुल्तान महमूद खिलजी (महमूद खिलजी प्रथम) पर सारंगपुर के युद्ध में प्राप्त विजय के स्मारक के रूप में करवाया। निर्माण प्रायः 1440 में आरंभ होकर 1448 ई. में पूर्ण माना जाता है। यह नौ (9) मंजिला भव्य स्तंभ लाल बलुआ पत्थर तथा सफेद संगमरमर से बना है, इसकी ऊँचाई लगभग 37.19 मीटर (लगभग 122 फीट) है और शिखर तक पहुँचने के लिए भीतर 157 सीढ़ियाँ बनी हैं। इसके प्रमुख वास्तुकार (सूत्रधार) जैता थे तथा उनके पुत्रों — नापा, पूजा एवं पोमा — ने भी निर्माण में सहयोग दिया, जिनके नाम स्तंभ पर उत्कीर्ण हैं। स्तंभ विष्णु को समर्पित होने के कारण इसे 'विष्णुध्वज' भी कहा गया है; इसकी दीवारों पर हिंदू देवी-देवताओं, विष्णु के अवतारों, रामायण-महाभारत के प्रसंगों तथा तत्कालीन सामाजिक जीवन की सैकड़ों प्रतिमाएँ अंकित हैं, जिसके कारण इसे 'भारतीय मूर्तिकला का विश्वकोश' कहा जाता है।

विजय स्तंभ की प्रशस्ति (शिलालेख) का महत्व अत्यधिक है — यह प्रशस्ति कवि अत्रि द्वारा रचना आरंभ की गई और उनकी मृत्यु के पश्चात उनके पुत्र महेश ने इसे पूर्ण किया। इस प्रशस्ति में मेवाड़ के गुहिल/सिसोदिया वंश की वंशावली, राणा कुम्भा की विजयों तथा उनके निर्माण-कार्यों का उल्लेख है, जो मेवाड़ के इतिहास का प्रमुख स्रोत है। एक रोचक तथ्य यह है कि हिंदू स्मारक होते हुए भी स्तंभ की कुछ मंजिलों पर अरबी में 'अल्लाह' शब्द उत्कीर्ण मिलता है, जिसे मध्यकालीन धार्मिक सहिष्णुता व शिल्पियों की समावेशी दृष्टि का प्रमाण माना जाता है।

कीर्ति स्तंभ, जिसे 'कीर्ति-स्तम्भ' या दिगंबर जैन स्तंभ कहा जाता है, विजय स्तंभ से पुराना है और 12वीं शताब्दी (कुछ मतानुसार लगभग 1300 ई. के आसपास तक) का निर्माण है। इसका निर्माण एक धनी दिगंबर जैन व्यापारी जीजाजी बघेरवाल (जीजा राठौड़/बघेरवाल) ने करवाया था और यह प्रथम जैन तीर्थंकर आदिनाथ (ऋषभदेव) को समर्पित है। यह सात (7) मंजिला स्तंभ लगभग 22 मीटर (लगभग 72 फीट) ऊँचा है, अर्थात विजय स्तंभ से नीचा और अधिक सादगीपूर्ण है। इसकी बाहरी दीवारों पर जैन तीर्थंकरों की अनेक नग्न (दिगंबर) प्रतिमाएँ उत्कीर्ण हैं तथा सबसे नीचे आदिनाथ की विशाल दिगंबर प्रतिमा है। परीक्षा-भ्रम से बचने के लिए स्मरणीय है — 'विजय=कुम्भा=विष्णु=9 मंजिल' तथा 'कीर्ति=जैन व्यापारी=आदिनाथ=7 मंजिल'।

विजय स्तंभ बनाम कीर्ति स्तंभ — तुलनात्मक रिवीजन सारणी
तथ्यविजय स्तंभकीर्ति स्तंभ
निर्माताराणा कुम्भा (मेवाड़)जीजाजी बघेरवाल (दिगंबर जैन व्यापारी)
निर्माण काल1440–1448 ई. (15वीं सदी)12वीं शताब्दी (विजय स्तंभ से प्राचीन)
उद्देश्य/स्मृतिमहमूद खिलजी (माळवा) पर सारंगपुर विजयजैन धर्म-कीर्ति; आदिनाथ को समर्पित
समर्पित देवताभगवान विष्णु ('विष्णुध्वज')प्रथम तीर्थंकर आदिनाथ (ऋषभदेव)
धर्महिंदू (वैष्णव)दिगंबर जैन
मंजिलें9 मंजिल7 मंजिल
ऊँचाईलगभग 37.19 मी (~122 फीट)लगभग 22 मी (~72 फीट)
सीढ़ियाँ157 सीढ़ियाँ54 सीढ़ियाँ (लगभग)
वास्तुकारसूत्रधार जैता व पुत्र (नापा, पूजा, पोमा)उल्लेख अस्पष्ट
प्रशस्ति रचयिताअत्रि; पूर्ण महेश द्वारा—
विजय स्तंभ — मुख्य तथ्य
बिंदुविवरण
अन्य नामजय स्तंभ / विष्णुध्वज
निर्माण सामग्रीलाल बलुआ पत्थर व सफेद संगमरमर
विजय-युद्धसारंगपुर का युद्ध (महमूद खिलजी प्रथम, माळवा)
शासनकाल (कुम्भा)1433–1468 ई.
विशेषताहिंदू देवी-देवताओं की सैकड़ों प्रतिमाएँ; 'मूर्तिकला का विश्वकोश'
उल्लेखनीय अंकनकुछ मंजिलों पर अरबी में 'अल्लाह' शब्द
कीर्ति स्तंभ — मुख्य तथ्य
बिंदुविवरण
निर्माताजीजाजी बघेरवाल (धनी दिगंबर जैन व्यापारी)
समर्पणप्रथम तीर्थंकर आदिनाथ (ऋषभदेव)
शैली/अंकनजैन तीर्थंकरों की नग्न (दिगंबर) प्रतिमाएँ
आधार-प्रतिमाआदिनाथ की विशाल दिगंबर मूर्ति
तुलनात्मक स्थितिविजय स्तंभ से प्राचीन, छोटा व सादा
मुख्य तथ्यविजय स्तंभ = राणा कुम्भा, 9 मंजिल, 157 सीढ़ियाँ, विष्णु को समर्पित (विष्णुध्वज), सारंगपुर में महमूद खिलजी पर विजय का स्मारक (1440–1448)।
मुख्य तथ्यकीर्ति स्तंभ = दिगंबर जैन व्यापारी जीजाजी बघेरवाल द्वारा 12वीं सदी में निर्मित, 7 मंजिल, ~22 मी, आदिनाथ (प्रथम तीर्थंकर) को समर्पित।
परीक्षा-भ्रमभ्रम से बचें — कीर्ति स्तंभ विजय स्तंभ से पुराना (12वीं सदी) है, नया नहीं; तथा यह जैन है, हिंदू नहीं। मंजिलें उलटी न करें: विजय=9, कीर्ति=7।
परीक्षा-भ्रमविजय स्तंभ की प्रशस्ति अत्रि ने आरंभ की पर पूर्ण उसके पुत्र महेश ने की — प्रश्न में 'रचयिता' के रूप में अकेले महेश या अकेले अत्रि का विकल्प भ्रामक हो सकता है; दोनों जुड़े हैं।
स्मरण-सूत्रस्मरण-सूत्र: 'विजय=विष्णु=9 मंजिल, कीर्ति=जैन=7 मंजिल'। (सावधानी: '9' मंजिलों की संख्या है — विष्णु के अवतार 'दस' (दशावतार) होते हैं, नौ नहीं।) तथा 'जैता ने जय (विजय) स्तंभ गढ़ा' — वास्तुकार जैता का नाम विजय से जोड़ें।
⚠ सत्यापन हेतु (5)
  • विजय स्तंभ का प्रारंभ वर्ष कुछ स्रोतों में 1440 तो कुछ में 1442 दिया जाता है; पूर्णता 1448 ई. सामान्यतः स्वीकृत है। सारंगपुर युद्ध की तिथि प्रायः 1437 ई. मानी जाती है।
  • कीर्ति स्तंभ की सीढ़ियों की संख्या (लगभग 54) तथा सटीक निर्माण-वर्ष पर स्रोतों में मतभेद है; इसे प्रायः 12वीं शताब्दी (कुछ मतानुसार 13वीं–14वीं सदी तक) माना जाता है।
  • निर्माता का नाम 'जीजाजी बघेरवाल' के साथ-साथ 'जीजा राठौड़' रूप में भी उल्लिखित मिलता है; बघेरवाल जैन समुदाय से संबद्ध होना अधिक प्रचलित है।
  • विजय स्तंभ की ऊँचाई प्रायः 37.19 मी दी जाती है, पर कुछ स्रोतों में 37.2 मी या 122 फीट के आस-पास भिन्न मान मिलते हैं।
  • कीर्ति स्तंभ की मंजिलें: अधिकांश परीक्षा-पुस्तकों में 7, किंतु ASI/विकिपीडिया में 6 मंजिल (54 सीढ़ियाँ) वर्णित — स्रोतभेद।

दुर्ग-रचना

चित्तौड़गढ़ दुर्ग: महल, मंदिर, जलस्रोत, प्रोल एवं जयमल-पत्ता स्मारक

चित्तौड़गढ़ दुर्ग मेवाड़ की गौरव-गाथा का केन्द्र है — बेड़च (बेराच) एवं गंभीरी नदियों के संगम-क्षेत्र में मेसा पठार पर लगभग 180 मीटर ऊँची पहाड़ी पर, करीब 700 एकड़ (280 हेक्टेयर) में फैला यह राजस्थान का सबसे विशाल दुर्ग है। गिरि-दुर्ग (पहाड़ी दुर्ग) की श्रेणी में गिने जाने वाले इस किले को 2013 में 'राजस्थान के पहाड़ी दुर्गों' के अन्तर्गत यूनेस्को विश्व धरोहर सूची में सम्मिलित किया गया। दुर्ग के भीतर महल, जैन-हिन्दू मंदिर, कीर्ति-विजय स्तंभ, अनेक जलाशय तथा सात रक्षा-प्रोल इसे एक स्वयंपूर्ण नगर-दुर्ग बनाते हैं। इसी दुर्ग ने तीन प्रसिद्ध शाके (साके) और जौहर देखे — 1303 (अलाउद्दीन खिलजी, रानी पद्मिनी), 1535 (बहादुरशाह गुजरात, रानी कर्णावती) तथा 1567-68 (अकबर, जयमल-पत्ता का साका)।

महलों में सबसे प्राचीन एवं भव्य 'राणा कुम्भा महल' है, जो महाराणा कुम्भा (1433-1468) से सम्बद्ध है; इसी के भूमिगत तहखानों में रानी पद्मिनी के जौहर की मान्यता जुड़ी है और यहीं भक्त-कवयित्री मीराबाई का निवास भी माना जाता है। 'पद्मिनी महल' जल-कुंड के मध्य बना श्वेत-भवन है, जिसके दर्पण में पद्मिनी का प्रतिबिम्ब देखने की जनश्रुति अलाउद्दीन खिलजी से जोड़ी जाती है। ब्रिटिश-कालीन 'फतह प्रकाश महल' महाराणा फतहसिंह (1884-1930) द्वारा निर्मित है और आज पुरातत्त्व-संग्रहालय के रूप में प्रयुक्त होता है। कुम्भा-कालीन 'शृंगार चँवरी' वस्तुतः शांतिनाथ को समर्पित एक अलंकृत जैन मंदिर है (लगभग 1448), जो अपने तोरण एवं शिल्प-सौन्दर्य के लिए विख्यात है।

दुर्ग के मंदिर स्थापत्य की दृष्टि से अत्यन्त समृद्ध हैं। महाराणा कुम्भा द्वारा पुनर्निर्मित 'कुम्भश्याम मंदिर' (कुम्भस्वामी) वराह-विष्णु को समर्पित इंडो-आर्यन शैली का मंदिर है, जिसके परिसर से मीराबाई की भक्ति जुड़ी है; समीप ही 'मीरा मंदिर' है। 'कालिका माता मंदिर' मूलतः 8वीं शताब्दी का सूर्य मंदिर था, जो उत्तरकाल में देवी कालिका को समर्पित कर दिया गया — यह परीक्षा में बार-बार पूछा जाने वाला रूपान्तरण-तथ्य है। परमार भोज-कालीन 'समिद्धेश्वर (समाधीश्वर) मंदिर' त्रिमूर्ति-शिव को समर्पित है, जिसका जीर्णोद्धार महाराणा मोकल ने कराया। 'तुलजा भवानी मंदिर' तथा सत्ताईस जैन देवालयों का समूह 'सतबीस देवरी' भी दुर्ग की धार्मिक विविधता के प्रतीक हैं।

जल-प्रबन्धन इस दुर्ग की सैन्य-शक्ति का आधार था। कहा जाता है कि दुर्ग में कभी 84 जलाशय (कुंड, बावड़ी, तालाब) थे, जिनकी जल-संग्रह क्षमता इतनी विशाल थी कि पचास हजार सैनिकों की सेना को वर्षों तक जल दे सके; आज इनमें से कुछ ही सुरक्षित हैं। इनमें प्राकृतिक झरने से पोषित पवित्र 'गौमुख कुंड' सर्वाधिक प्रसिद्ध है, जहाँ गाय के मुख-आकृति से जल गिरता है; 'हाथी कुंड' भी उल्लेखनीय है।

दुर्ग की चढ़ाई सात विशाल रक्षा-प्रोलों (द्वारों) से होकर गुजरती है, जो क्रमशः शत्रु एवं हाथी-आक्रमण को रोकने हेतु बनाए गए थे — पादन (पाडन) प्रोल, भैरों प्रोल, हनुमान प्रोल, गणेश प्रोल, जोरला प्रोल, लक्ष्मण प्रोल एवं अन्त में विशालतम राम प्रोल। इन्हीं प्रोलों के बीच 1567-68 के अकबर-आक्रमण में वीरगति प्राप्त 'जयमल (मेड़तिया) एवं पत्ता (सिसोदिया/चूंडावत)' की छतरियाँ (स्मारक) स्थित हैं; इनकी वीरता से प्रभावित होकर अकबर ने आगरा दुर्ग के द्वार पर इनकी गजारूढ़ प्रतिमाएँ स्थापित करवाईं — यह तथ्य परीक्षा-दृष्टि से अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है।

पादन भैरों हनुमान गणेश जोरला लक्ष्मण राम ★
सात प्रोल (क्रम): पादन → भैरों → हनुमान → गणेश → जोरला → लक्ष्मण → राम।
प्रमुख महल एवं भवन — निर्माता/सम्बद्धता एवं विशेषता
भवनसम्बद्ध शासक/निर्माताविशेष तथ्य
राणा कुम्भा महलमहाराणा कुम्भा (1433-1468)दुर्ग का सबसे प्राचीन/भव्य महल; भूमिगत तहखानों में पद्मिनी जौहर की मान्यता; मीराबाई का निवास
पद्मिनी महलरावल रतनसिंह-काल से सम्बद्धजल-कुंड के मध्य श्वेत भवन; दर्पण-प्रतिबिम्ब की जनश्रुति (अलाउद्दीन खिलजी)
फतह प्रकाश महलमहाराणा फतहसिंह (1884-1930)आधुनिक निर्माण; वर्तमान में पुरातत्त्व संग्रहालय
शृंगार चँवरीकुम्भा-काल (~1448)शांतिनाथ को समर्पित अलंकृत जैन मंदिर; सुन्दर तोरण-शिल्प
प्रमुख मंदिर — देवता, काल एवं तथ्य
मंदिरसमर्पित/देवतानिर्माण/जीर्णोद्धार व तथ्य
कुम्भश्याम मंदिरवराह-विष्णुकुम्भा द्वारा पुनर्निर्मित (~1449), इंडो-आर्यन शैली; मीरा-भक्ति से जुड़ा
मीरा मंदिरकृष्ण/मीराबाईकुम्भश्याम परिसर के निकट; भक्ति-परम्परा का केन्द्र
कालिका माता मंदिरमूलतः सूर्य (बाद में कालिका)8वीं सदी का सूर्य मंदिर; उत्तरकाल में देवी कालिका को समर्पित
समिद्धेश्वर (समाधीश्वर)शिव (त्रिमूर्ति)परमार भोज-काल (11वीं सदी); जीर्णोद्धार महाराणा मोकल
तुलजा भवानीदेवी भवानीशक्ति-उपासना केन्द्र
सतबीस देवरीजैन (27 देवालय)जैन तीर्थंकरों को समर्पित मंदिर-समूह
प्रमुख जलस्रोत
जलस्रोतविशेषता
गौमुख कुंडप्राकृतिक झरने से पोषित पवित्र कुंड; गोमुख-आकृति से जलधारा
हाथी कुंडदुर्ग का प्रमुख जलाशय
84 जलाशय (कुल)कुंड/बावड़ी/तालाब मिलाकर; विशाल जल-संग्रह क्षमता — दीर्घ घेराबंदी में सैन्य-आधार
सात प्रोल (द्वार) — चढ़ाई क्रम में
क्रमप्रोलटिप्पणी
1पादन (पाडन) प्रोलप्रथम/सबसे नीचे का द्वार
2भैरों प्रोलनिकट जयमल-कल्ला स्मारक-क्षेत्र
3हनुमान प्रोल—
4गणेश प्रोल—
5जोरला प्रोललक्ष्मण प्रोल से जुड़ा
6लक्ष्मण प्रोल—
7राम प्रोलअन्तिम एवं विशालतम मुख्य द्वार
तीन शाके/जौहर — रटने योग्य
वर्षआक्रमणकारीसम्बद्ध व्यक्ति/जौहर
1303अलाउद्दीन खिलजीरावल रतनसिंह; रानी पद्मिनी का जौहर
1535बहादुरशाह (गुजरात)रानी कर्णावती का जौहर
1567-68अकबरजयमल-पत्ता का साका
मुख्य तथ्यचित्तौड़गढ़ राजस्थान का सबसे बड़ा दुर्ग है; बेड़च-गंभीरी क्षेत्र में मेसा पठार पर स्थित तथा 2013 में यूनेस्को विश्व धरोहर घोषित।
मुख्य तथ्यकालिका माता मंदिर मूलतः 8वीं शताब्दी का सूर्य मंदिर था, जो बाद में देवी कालिका को समर्पित किया गया।
मुख्य तथ्यजयमल (मेड़तिया) एवं पत्ता (सिसोदिया) 1567-68 के अकबर-आक्रमण के वीर; अकबर ने आगरा दुर्ग-द्वार पर इनकी गजारूढ़ प्रतिमाएँ लगवाईं।
परीक्षा-भ्रमफतह प्रकाश महल कुम्भा-कालीन नहीं है — इसे महाराणा फतहसिंह (1884-1930) ने बनवाया; प्राचीन महल 'राणा कुम्भा महल' है।
परीक्षा-भ्रमशृंगार चँवरी कोई शृंगार-कक्ष नहीं बल्कि शांतिनाथ को समर्पित जैन मंदिर है; इसे कालिका/शक्ति मंदिर समझने की भूल न करें।
परीक्षा-भ्रमसमिद्धेश्वर (शिव) मंदिर परमार भोज-काल का है — जीर्णोद्धार मोकल ने कराया, मूल निर्माण कुम्भा का नहीं।
स्मरण-सूत्रसात प्रोलों का क्रम याद रखने की पंक्ति: 'पादन भैरों हनु गणेश, जोरला लक्ष्मण राम प्रवेश' — पादन→भैरों→हनुमान→गणेश→जोरला→लक्ष्मण→राम।
स्मरण-सूत्रजल की कहानी: '84 जलाशय, पचास हजार सैनिक, वर्षों की घेराबंदी' — इसी जल-भंडार ने चित्तौड़ को दीर्घ अवरोध सहने की शक्ति दी।
⚠ सत्यापन हेतु (6)
  • शृंगार चँवरी के निर्माता का ठीक नाम (कुम्भा के कोषाध्यक्ष/भण्डारी वेलाका द्वारा ~1448 निर्मित मानी जाती है) — विभिन्न स्रोतों में नाम-भिन्नता है।
  • तुलजा भवानी मंदिर का निर्माता (कुछ स्रोत बनवीर को श्रेय देते हैं) निश्चयपूर्वक सत्यापित नहीं।
  • 84 जलाशयों में से वर्तमान में सुरक्षित/शेष जलाशयों की सटीक संख्या (लगभग 22 उद्धृत होती है) स्रोत-सापेक्ष है।
  • कालिका माता मंदिर के सूर्य से कालिका में रूपान्तरण का ठीक सदी/शासक विवरण स्रोतों में भिन्न है।
  • भैरों प्रोल के निकट कल्ला राठौड़ (जयमल के भाई/सम्बन्धी) की छतरी का उल्लेख कुछ स्रोतों में; जयमल एवं पत्ता की छतरियों की प्रोल-विशिष्ट स्थिति में स्रोत-भेद।
  • चित्तौड़ दुर्ग-वर्ग: यह गिरि-दुर्ग (पहाड़ी दुर्ग) है — जल-दुर्ग नहीं; UNESCO सूची भी 'Hill Forts of Rajasthan' है।

व्यक्तित्व

प्रमुख व्यक्तित्व एवं विविध/परीक्षा-तथ्य — चित्तौड़गढ़ दुर्ग

चित्तौड़गढ़ दुर्ग केवल पाषाण-प्राचीरों का समूह नहीं, अपितु राजस्थानी शौर्य, भक्ति, त्याग और सांस्कृतिक उत्कर्ष का जीवंत संग्रहालय है। यहाँ भक्ति-आंदोलन की सर्वोच्च प्रतीक मीराबाई की कृष्ण-साधना, पन्ना धाय के अद्वितीय आत्म-त्याग, राणा कुम्भा के संगीत-स्थापत्य वैभव, तथा राणा सांगा के अंतिम हिंदू-प्रतिरोध की स्मृतियाँ एक साथ गुँथी हुई हैं। RAS एवं RPSC EO/RO परीक्षाओं की दृष्टि से इस दुर्ग से जुड़े व्यक्तित्व, उनके उपनाम, ग्रंथ, अभिलेख तथा विदेशी वर्णन बार-बार प्रश्न-रूप में लौटते हैं, अतः इन्हें कालक्रम एवं कारण-परिणाम सहित स्मरण करना अनिवार्य है।

मीराबाई (लगभग 1498–1547) मेड़ता के राठौड़ रत्नसिंह की पुत्री थीं, जिनका विवाह लगभग 1516 में महाराणा सांगा के ज्येष्ठ पुत्र भोजराज से हुआ; 1521 में भोजराज की मृत्यु के पश्चात मीरा पूर्णतः कृष्ण-भक्ति में लीन हो गईं। उनके गुरु संत रैदास (रविदास) माने जाते हैं। 'पदावली', 'नरसीजी रो मायरो', 'राग गोविंद', 'राग सोरठ' तथा 'गीत गोविंद की टीका' उनकी प्रसिद्ध रचनाएँ हैं। चित्तौड़ दुर्ग स्थित 'मीरा मंदिर' (कुम्भश्याम मंदिर परिसर) उनकी भक्ति-स्मृति का केंद्र है। इसके विपरीत पन्ना धाय ने त्याग की पराकाष्ठा प्रस्तुत की — जब बनवीर ने उदयसिंह (द्वितीय) की हत्या का षड्यंत्र रचा, तब पन्ना धाय ने अपने पुत्र चंदन को राजकुमार के स्थान पर सुला कर बलिदान दे दिया और उदयसिंह को कुम्भलगढ़ भेजकर मेवाड़ के भावी शासक की रक्षा की (लगभग 1535–36)।

राणा कुम्भा (शासनकाल 1433–1468) मेवाड़ के स्वर्णयुग के निर्माता थे — योद्धा, स्थापत्यकार, संगीतज्ञ एवं विद्वान। मालवा के महमूद खिलजी पर विजय के उपलक्ष्य में उन्होंने विजय स्तंभ (कीर्ति की चरम अभिव्यक्ति) का निर्माण करवाया। संगीत के क्षेत्र में उनका 'संगीतराज' अद्वितीय है, तथा जयदेव के 'गीत गोविंद' पर लिखी उनकी टीका 'रसिकप्रिया' प्रसिद्ध है; 'सूडप्रबंध' एवं 'कामराज रतिसार' भी उनकी रचनाएँ मानी जाती हैं। उन्हें 'अभिनव भरताचार्य', 'हिंदू सुरत्राण', 'राणा रासो', 'दानगुरु/छापगुरु' आदि उपनाम प्राप्त थे। राणा सांगा (संग्रामसिंह, 1509–1528) मेवाड़ के अंतिम महान हिंदू सम्राट कहे जाते हैं, जिन्होंने खातौली, बाड़ी एवं अंततः खानवा (16 मार्च 1527) में इब्राहीम लोदी व बाबर से संघर्ष किया; कहा जाता है कि उनके शरीर पर लगभग 80 घाव थे, एक हाथ, एक आँख एवं एक पैर की क्षति उन्होंने युद्धों में सही थी।

दुर्ग के दो प्रमुख स्तंभ — विजय स्तंभ एवं कीर्ति स्तंभ — इसके स्थापत्य-गौरव के प्रतीक हैं। विजय स्तंभ के अभिलेख (प्रशस्ति) की रचना कवि अत्रि ने आरंभ की तथा उनके पुत्र कवि महेश ने पूर्ण की; इस प्रशस्ति में मेवाड़ के गुहिल शासकों की वंशावली उत्कीर्ण है। चित्तौड़ का विस्तृत वर्णन अकबर के दरबारी इतिहासकार अबुल फजल ने 'आइन-ए-अकबरी' में किया है। वर्ष 2013 में यूनेस्को ने चित्तौड़गढ़ को 'राजस्थान के पहाड़ी दुर्गों' (Hill Forts of Rajasthan) के अंतर्गत विश्व धरोहर घोषित किया। परीक्षा की दृष्टि से सर्वाधिक भ्रम-बिंदु 'प्रथम साका' का है — राजस्थान का प्रथम साका रणथंभौर में 1301 (हम्मीरदेव चौहान बनाम अलाउद्दीन खिलजी) में हुआ, जबकि चित्तौड़ का प्रथम साका 1303 में (अलाउद्दीन बनाम रावल रतनसिंह) हुआ। अभ्यर्थी प्रायः इन दोनों तिथियों को मिला देते हैं।

प्रमुख व्यक्तित्व — एक दृष्टि में
व्यक्तित्वकाल/संबंधप्रमुख योगदान/तथ्य
मीराबाईलगभग 1498–1547; भोजराज (सांगा-पुत्र) की पत्नीकृष्ण-भक्त कवयित्री; गुरु रैदास; रचनाएँ — पदावली, राग गोविंद, राग सोरठ, नरसीजी रो मायरो; चित्तौड़ में मीरा मंदिर
पन्ना धायलगभग 1535–36; उदयसिंह द्वितीय की धायबनवीर से उदयसिंह को बचाने हेतु अपने पुत्र चंदन का बलिदान; त्याग की प्रतिमूर्ति
राणा कुम्भाशासन 1433–1468विजय स्तंभ निर्माता; ग्रंथ — संगीतराज, रसिकप्रिया, सूडप्रबंध; उपनाम — अभिनव भरताचार्य, हिंदू सुरत्राण
राणा सांगा (संग्रामसिंह)शासन 1509–1528खानवा युद्ध (1527) में बाबर से संघर्ष; शरीर पर ~80 घाव; अंतिम महान हिंदू प्रतिरोध
कवि अत्रि एवं महेशकुम्भा-काल (15वीं सदी)पिता अत्रि ने विजय स्तंभ प्रशस्ति आरंभ की, पुत्र महेश ने पूर्ण की
राणा कुम्भा — ग्रंथ एवं उपनाम (रटने योग्य)
श्रेणीविवरण
संगीत ग्रंथसंगीतराज (प्रमुख), संगीत मीमांसा, सूडप्रबंध
साहित्यिक टीकारसिकप्रिया (जयदेव के गीत गोविंद पर टीका)
अन्य रचनाएँकामराज रतिसार, संगीत रत्नाकर की टीका
उपनामअभिनव भरताचार्य, हिंदू सुरत्राण, राणा रासो, दानगुरु/छापगुरु, नंदिकेश्वर अवतार
स्थापत्यविजय स्तंभ, कुम्भलगढ़ दुर्ग, कुम्भश्याम मंदिर, अनेक दुर्ग (कुल 32 दुर्गों में से अनेक)
चित्तौड़ के दो प्रमुख स्तंभ — तुलना
तथ्यविजय स्तंभकीर्ति स्तंभ
निर्माताराणा कुम्भाजैन व्यापारी जीजा/जीजाजी बघेरवाल
काल1440–1448 ई.12वीं शताब्दी (लगभग)
समर्पित/उपलक्ष्यमहमूद खिलजी (मालवा) पर विजय; विष्णु को समर्पितप्रथम जैन तीर्थंकर आदिनाथ को समर्पित
मंज़िल/ऊँचाई9 मंज़िल, लगभग 37 मीटर7 मंज़िल, लगभग 22 मीटर
प्रशस्ति-रचयिताकवि अत्रि व पुत्र महेश—
चित्तौड़ के तीन साके बनाम रणथंभौर का प्रथम साका (परीक्षा-केंद्रित)
साकावर्षआक्रमणकारी बनाम रक्षकजौहर-नेतृत्व
रणथंभौर प्रथम साका1301अलाउद्दीन खिलजी बनाम हम्मीरदेव चौहानरंगदेवी (परंपरा)
चित्तौड़ प्रथम साका1303अलाउद्दीन खिलजी बनाम रावल रतनसिंहरानी पद्मिनी
चित्तौड़ द्वितीय साका1535बहादुर शाह (गुजरात) बनाम विक्रमादित्यरानी कर्णावती
चित्तौड़ तृतीय साका1568अकबर बनाम जयमल-पत्ता (शासक उदयसिंह द्वितीय)जौहर — दुर्ग की स्त्रियाँ (नाम अपुष्ट)
विविध परीक्षा-तथ्य
तथ्यविवरण
यूनेस्को विश्व धरोहर2013 में 'राजस्थान के पहाड़ी दुर्ग' के अंतर्गत — चित्तौड़गढ़, कुम्भलगढ़, रणथंभौर, आमेर, जैसलमेर, गागरोन (कुल 6)
विदेशी/समकालीन वर्णनअबुल फजल — आइन-ए-अकबरी में चित्तौड़ का वर्णन
दुर्ग-श्रेणीगिरि दुर्ग (पहाड़ी दुर्ग); मेवाड़ की प्राचीन राजधानी
उपनाम'राजस्थान का गौरव', 'दुर्गों का सिरमौर', 'चित्रकूट'
प्रमुख जलाशय/स्थलगौमुख कुंड, विजय स्तंभ, कीर्ति स्तंभ, पद्मिनी महल, कालिका माता मंदिर, मीरा मंदिर
परीक्षा-भ्रमप्रथम साका का भ्रम: राजस्थान का प्रथम साका रणथंभौर (1301) में हुआ, चित्तौड़ का प्रथम साका 1303 में। प्रश्न में 'राजस्थान का प्रथम साका' पूछे तो उत्तर 1301 रणथंभौर, और 'चित्तौड़ का प्रथम साका' पूछे तो 1303।
मुख्य तथ्यराणा कुम्भा = संगीत + स्थापत्य। ग्रंथ 'संगीतराज' व 'रसिकप्रिया' तथा उपनाम 'अभिनव भरताचार्य' व 'हिंदू सुरत्राण' अवश्य याद रखें। विजय स्तंभ (1440–1448, 9 मंज़िल) उन्हीं की देन है।
परीक्षा-भ्रमविजय स्तंभ बनाम कीर्ति स्तंभ मत मिलाएँ — विजय स्तंभ राणा कुम्भा ने विष्णु को समर्पित कर बनवाया (9 मंज़िल); कीर्ति स्तंभ जैन व्यापारी ने आदिनाथ को समर्पित कर बनवाया (7 मंज़िल, अधिक प्राचीन)।
स्मरण-सूत्रपन्ना धाय की कथा त्याग का पर्याय है — 'माँ ने राज्य के लिए अपना पुत्र चंदन बलि चढ़ा दिया, और मेवाड़ का दीपक उदयसिंह बचा लिया।' यही उदयसिंह आगे चलकर उदयपुर के संस्थापक बने।
मुख्य तथ्ययूनेस्को 2013 — चित्तौड़गढ़ सहित राजस्थान के 6 पहाड़ी दुर्ग विश्व धरोहर। मीराबाई का ससुराल संबंध: भोजराज (राणा सांगा का पुत्र)।
⚠ सत्यापन हेतु (4)
  • मीराबाई की जन्म व मृत्यु तिथियाँ (लगभग 1498–1547) एवं भोजराज से विवाह वर्ष (लगभग 1516) स्रोतों में भिन्न हैं; परंपरागत रूप से यही सर्वाधिक स्वीकृत हैं।
  • कीर्ति स्तंभ का सटीक निर्माण-काल (12वीं शताब्दी) एवं निर्माता का नाम (जीजा/जीजाजी बघेरवाल) विभिन्न स्रोतों में थोड़ा भिन्न मिलता है।
  • पन्ना धाय के बलिदान का वर्ष (लगभग 1535–36) तथा बनवीर-प्रकरण की सटीक तिथि पर स्रोतों में मामूली मतभेद है।
  • राणा कुम्भा को कुल 32 दुर्गों के निर्माण का श्रेय दिया जाता है, किंतु यह संख्या परंपरागत आकलन पर आधारित है।

स्रोत

स्रोत एवं सत्यापन

यह नोट तथ्य-सत्यापन (audit) से गुज़रा है — 18 त्रुटियाँ (जौहर-तिथियाँ, शासक-नाम, दुर्ग-वर्ग, माप आदि) खोजी व सुधारी गईं। जहाँ स्रोतों में मतभेद है, वहाँ प्रत्येक अनुभाग के अंत में "⚠ सत्यापन हेतु" में स्पष्ट किया गया है।

प्रयुक्त स्रोत
प्रकारस्रोत
सामग्री-आधारविकिपीडिया — चित्तौड़गढ़ दुर्ग एवं संबंधित लेख (बप्पा रावल, राणा साँगा/कुम्भा, उदयसिंह द्वितीय, तीनों घेरे 1303/1535/1567-68, जयमल-पत्ता, मीराबाई); ये लेख ASI, इतिहासकार गांगुली/सोमानी एवं अकबरनामा को उद्धृत करते हैं
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