राजपूत चित्रशैलियाँ · मेवाड़-किशनगढ़-बूँदी-जयपुर-बीकानेर-मारवाड़-नाथद्वारा-अलवर-देवगढ़-उणियारा · चित्रकार-रंग-विशेषता — संपूर्ण अध्याय
बणी-ठणी (किशनगढ़ शैली) — निहालचंद कृत 'भारत की मोनालिसा'Nihal Chand · Public domain · Wikimedia Commons
शुरू करने से पहले
राजस्थानी चित्रकला (राजपूत चित्रकला) मध्यकालीन राजस्थान के राजदरबारों में पनपी लघु-चित्रण (Miniature Painting) की परंपरा है, जिसमें रामायण-महाभारत, राग-रागिनी, बारहमासा, कृष्ण-लीला, शिकार व दरबारी जीवन को छोटे आकार के चित्रों में रंगा गया। यह दो बड़ी शाखाओं में बँटी है — मेवाड़ स्कूल और मारवाड़ स्कूल — तथा इनके अंतर्गत मेवाड़, किशनगढ़, बूँदी-कोटा, जयपुर(ढूँढाड़), बीकानेर, जोधपुर(मारवाड़), नाथद्वारा, अलवर, देवगढ़ व उणियारा जैसी प्रमुख उपशैलियाँ विकसित हुईं। CET में यहाँ से 'शैली ↔ जिला ↔ प्रसिद्ध चित्रकार ↔ विशेषता/रंग ↔ संरक्षक राजा' के सीधे मिलान-प्रश्न तथा 'बणी-ठणी किस शैली की', 'पिछवाई कहाँ की', 'उस्ता कला कहाँ की' जैसे एकल तथ्य पूछे जाते हैं। इस पृष्ठ को ऐसे पढ़ें — पहले शैली का जिला व संरक्षक याद करें, फिर उसका सबसे प्रसिद्ध चित्रकार व चित्र, और अंत में उसकी पहचान-विशेषता (रंग/विषय)। नीचे दी तालिकाओं व मानचित्र से बार-बार दोहराएँ।
1. राजस्थानी चित्रकला — आधार व वर्गीकरण
राजस्थानी चित्रकला से तात्पर्य राजस्थान के विभिन्न रजवाड़ों (रियासतों) में 16वीं से 19वीं शताब्दी के बीच विकसित लघु-चित्रों की शैलियों से है। ये चित्र प्रायः हस्तनिर्मित कागज, कपड़े या भित्ति (दीवार) पर खनिज एवं वनस्पति रंगों से बनाए जाते थे। आनंद कुमारस्वामी ने अपनी पुस्तक 'राजपूत पेंटिंग' (1916) में सर्वप्रथम इसे 'राजपूत चित्रकला' नाम देकर मुगल शैली से अलग पहचान दी।
मूल विषय — कृष्ण-लीला, राधा-कृष्ण, रामायण-महाभारत के प्रसंग, राग-रागिनी (संगीत के रागों का चित्रण), बारहमासा (12 महीनों का श्रृंगार), नायक-नायिका भेद, शिकार व दरबारी जीवन।
रंग (पिगमेंट) — खनिज व वनस्पति रंग — हिंगुल/सिंदूरी लाल, हरिताल (पीला), लाजवर्द/नील (नीला), सफेदा (सफेद), सोने-चाँदी का वर्क। ब्रश गिलहरी/ऊँट के बालों का।
दो मुख्य शाखाएँ — (1) मेवाड़ स्कूल — मेवाड़, बूँदी-कोटा, देवगढ़, उणियारा आदि; (2) मारवाड़ स्कूल — जोधपुर, बीकानेर, किशनगढ़, जैसलमेर, नागौर आदि। ढूँढाड़ (जयपुर-आमेर) पर मुगल प्रभाव अधिक रहा।
मुगल प्रभाव — अकबर-जहाँगीर काल में राजपूत राजा मुगल दरबार से जुड़े; इससे राजस्थानी शैली पर मुगल शैली का प्रभाव पड़ा (विशेषकर जयपुर व बीकानेर पर)। फिर भी मेवाड़-बूँदी ने अपनी देशी पहचान बनाए रखी।
याद रखें — हर शैली की पहचान उसके 'जिले + संरक्षक राजा + प्रसिद्ध चित्रकार + विशेष विषय/रंग' से होती है। यही चार बिंदु CET में मिलान के रूप में पूछे जाते हैं।
रागमाला लघु-चित्र — राजस्थानी राजपूत चित्रकला की एक झलकSahibdin · Public domain · Wikimedia Commons
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'राजपूत पेंटिंग' (1916) पुस्तक — आनंद कुमारस्वामी; राजस्थानी शैली को पहचान दी।
दो शाखाएँ — मेवाड़ स्कूल व मारवाड़ स्कूल; ढूँढाड़ पर मुगल प्रभाव।
मुख्य विषय — कृष्ण-लीला, राग-रागिनी, बारहमासा, शिकार, दरबार।
रंग खनिज-वनस्पति से; सोने-चाँदी का प्रयोग।
2. मेवाड़ शैली — साहिबदीन व नसीरुद्दीन
मेवाड़ शैली राजस्थानी चित्रकला की सबसे प्राचीन व आधार-शैली मानी जाती है। इसका केंद्र उदयपुर (व पूर्व में चित्तौड़/चावंड) रहा। इस शैली की सर्वाधिक प्रामाणिक व प्राचीन तिथित कृति है — 'श्रावक प्रतिक्रमण सूत्र चूर्णि' (1260 ई., आहड़)।
केंद्र व काल — उदयपुर (चावंड, नाथद्वारा क्षेत्र); 16वीं-17वीं शताब्दी में चरम पर। महाराणा प्रताप के पुत्र अमर सिंह प्रथम तथा जगत सिंह प्रथम के काल में फली-फूली (चावंड व उदयपुर केंद्र)।
नसीरुद्दीन (निसारदी) — चावंड शैली का प्रमुख चित्रकार; अमर सिंह प्रथम के काल में 'रागमाला' (1605, चावंड) चित्रित की — यह मेवाड़ की प्रारंभिक प्रसिद्ध कृति है।
साहिबदीन — मेवाड़ का सर्वश्रेष्ठ चित्रकार; महाराणा जगत सिंह प्रथम के दरबारी चित्रकार। 'रामायण', 'भागवत', 'गीत गोविंद', 'रागमाला' चित्रित कीं। इनकी कृतियाँ शैली की पहचान हैं।
रंग व विशेषता — चटक/भड़कीले रंग — लाल (हिंगुल) व पीले की प्रधानता; आकृतियाँ भरी-पूरी; पुरुष पात्रों की बड़ी आँखें, छोटा कद; पृष्ठभूमि में स्थापत्य व बाग।
मेवाड़ की उपशैलियाँ — नाथद्वारा (पिछवाई), देवगढ़ व चावंड इसी से निकलीं। 'चावंड शैली' को मेवाड़ चित्रकला की नींव कहा जाता है। महाराणा जगत सिंह प्रथम ने उदयपुर में 'चितेरों की ओवरी' (तस्वीरों री ओवरी) नामक चित्रशाला बनवाई।
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मेवाड़ = सबसे प्राचीन/आधार शैली; केंद्र उदयपुर-चावंड।
नसीरुद्दीन (निसारदी) → 'रागमाला' (1605, चावंड); अमर सिंह प्रथम का काल।
साहिबदीन → 'रामायण', 'भागवत', 'गीत गोविंद'; जगत सिंह प्रथम का चित्रकार।
रंग — लाल-पीला प्रधान; 'चितेरों की ओवरी' चित्रशाला (उदयपुर)।
3. किशनगढ़ शैली — बणी-ठणी, निहालचंद, नागरीदास
किशनगढ़ शैली राजस्थानी चित्रकला की सबसे सुंदर व श्रृंगारिक शैली मानी जाती है। इसका केंद्र किशनगढ़ (अजमेर जिला) है। यह राधा-कृष्ण के भक्ति-प्रेम पर आधारित है और अपनी अनुपम नायिका 'बणी-ठणी' के लिए विश्वप्रसिद्ध है।
संरक्षक — राजा सावंत सिंह (नागरीदास) — किशनगढ़ नरेश सावंत सिंह स्वयं कृष्णभक्त कवि थे, जो 'नागरीदास' उपनाम से रचना करते थे। इन्हीं के संरक्षण में शैली अपने चरम पर पहुँची।
निहालचंद — प्रमुख चित्रकार — सावंत सिंह के दरबारी चित्रकार निहालचंद ने सन् 1757 के आसपास प्रसिद्ध 'बणी-ठणी' चित्र बनाया। माना जाता है कि यह राजा की प्रेमिका 'बणी-ठणी' (एक गायिका) पर आधारित है।
बणी-ठणी — 'भारत की मोनालिसा' — एरिक डिक्सन ने इसे 'भारत की मोनालिसा' कहा। भारत सरकार ने 1973 में इस पर डाक टिकट जारी किया। पहचान — लंबी धनुषाकार भौंहें, खंजनाकार (मीन जैसी) लंबी आँखें, नुकीली नाक, पतले होंठ, लंबी छरहरी देह।
रंग व विशेषता — गुलाबी, हल्के व कोमल रंग; पृष्ठभूमि में किशनगढ़ की 'गूँदलाव झील', सरोवर, कमल व नौका-विहार; सुरमई आसमान। प्रमुख विषय — राधा-कृष्ण की प्रेम-लीला।
किशनगढ़ शैली का स्वर्ण-काल राजा सावंत सिंह (नागरीदास) व चित्रकार निहालचंद की जोड़ी से जुड़ा है। इस शैली की नायिका 'बणी-ठणी' राजस्थानी चित्रकला की सबसे लोकप्रिय परीक्षा-तथ्य है।
किशनगढ़ शैली — राधा-कृष्ण व झील-नौका, कोमल गुलाबी रंगUnknownUnknown edit · Public domain · Wikimedia Commons
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किशनगढ़ (अजमेर) — सर्वाधिक सुंदर/श्रृंगारिक शैली; विषय राधा-कृष्ण।
संरक्षक राजा सावंत सिंह = कवि 'नागरीदास'; चित्रकार निहालचंद।
'बणी-ठणी' (≈1757, निहालचंद) = 'भारत की मोनालिसा'; 1973 में डाक टिकट।
बूँदी व कोटा (हाड़ौती क्षेत्र) की शैलियाँ प्रकृति-चित्रण व शिकार-दृश्यों के लिए प्रसिद्ध हैं। मूलतः ये एक ही 'बूँदी शैली' से निकलीं; 1631 में कोटा रियासत अलग होने पर 'कोटा शैली' स्वतंत्र रूप से विकसित हुई।
बूँदी शैली — पहचान — वृक्ष-लता, हरीतिमा, तालाब-फव्वारे, बादल व प्राकृतिक दृश्यों का सजीव चित्रण; आम के पेड़, केले के पत्ते व पक्षी विशेष। नारी सौंदर्य (पान खाती नायिका) व बारहमासा प्रमुख विषय।
बूँदी — रंग व चित्र — हरे व नीले रंग की प्रधानता; लाल-पीली पृष्ठभूमि। प्रसिद्ध — 'चित्रशाला' (बूँदी का गढ़-महल) की भित्ति-चित्रकारी, जो राग-रागिनी व कृष्ण-लीला से सजी है।
कोटा शैली — शिकार दृश्य — कोटा शैली शिकार (आखेट) दृश्यों — विशेषकर शेर, बाघ व हाथी के शिकार — के सजीव व गतिशील चित्रण के लिए सर्वाधिक प्रसिद्ध है। महाराव राम सिंह व उम्मेद सिंह के काल में चरम पर।
कोटा — विशेष — घने जंगल, पहाड़ी पृष्ठभूमि में शिकार; स्त्री-शिकारी का चित्रण भी मिलता है। चित्रकार — शेख ताजु, रघुनाथ, डालू आदि। महिला शिकार दृश्यों के लिए अद्वितीय।
ध्यान दें — बूँदी = प्रकृति/नारी सौंदर्य/चित्रशाला; कोटा = शिकार दृश्य। दोनों को परीक्षा में अलग पहचानें। शिकार-चित्रण कोटा शैली की सबसे बड़ी पहचान है।
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बूँदी-कोटा = हाड़ौती क्षेत्र; मूल एक ही बूँदी शैली से (कोटा 1631 में अलग)।
कोटा — शिकार (शेर/बाघ/हाथी) दृश्यों के लिए सबसे प्रसिद्ध; महिला शिकार भी।
बूँदी में हरे-नीले रंग प्रधान; कोटा चित्रकार — शेख ताजु, रघुनाथ।
5. जयपुर (ढूँढाड़) शैली — साहिबराम
जयपुर शैली (ढूँढाड़ शैली) आमेर-जयपुर क्षेत्र में विकसित हुई और इस पर मुगल शैली का सर्वाधिक प्रभाव रहा। राजा मानसिंह व सवाई जयसिंह से लेकर सवाई प्रतापसिंह व सवाई रामसिंह द्वितीय के काल में यह चरम पर पहुँची।
केंद्र व संरक्षक — आमेर व जयपुर; सवाई प्रतापसिंह (1779-1803) का काल स्वर्ण-युग। इन्होंने 'सूरतखाना' (चित्रशाला) को संगठित किया जहाँ अनेक चित्रकार कार्यरत थे।
साहिबराम — प्रमुख चित्रकार — जयपुर शैली के सबसे प्रसिद्ध चित्रकार; सवाई प्रतापसिंह के दरबारी। इन्होंने राजा सवाई प्रतापसिंह का आदमकद (life-size) भव्य चित्र बनाया, जो जयपुर शैली की पहचान है।
रंग व विशेषता — बड़े आकार के पोर्ट्रेट (व्यक्ति-चित्र); भव्यता व सोने का प्रचुर प्रयोग; आदमकद चित्रण की परंपरा। विषय — राधा-कृष्ण, दरबारी दृश्य, राजपरिवार के चित्र।
अन्य चित्रकार — गोपाल, लालचंद, सालिगराम, हुकमा आदि। कागज-निर्माण व चित्रकला के लिए जयपुर का 'सूरतखाना' प्रसिद्ध रहा।
जयपुर/ढूँढाड़ शैली की पहचान — आदमकद व्यक्ति-चित्र (पोर्ट्रेट), मुगल-प्रभाव व भव्यता। प्रमुख चित्रकार साहिबराम (मेवाड़ के साहिबदीन से अलग — नाम मिलते-जुलते, पर शैली व काल भिन्न)।
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जयपुर शैली = ढूँढाड़ शैली; आमेर-जयपुर; मुगल प्रभाव सर्वाधिक।
प्रमुख चित्रकार साहिबराम → सवाई प्रतापसिंह का आदमकद चित्र।
पहचान — बड़े पोर्ट्रेट, सोने का प्रयोग, भव्यता।
6. बीकानेर (उस्ता कला) व मारवाड़ (जोधपुर)
उत्तर-पश्चिमी राजस्थान की दो शैलियाँ — बीकानेर व मारवाड़(जोधपुर)। बीकानेर पर मुगल व दक्षिणी(दक्कनी) प्रभाव रहा, जबकि मारवाड़ शैली अपनी देशी, लोक-रंग में रंगी रही।
बीकानेर शैली — संरक्षक — राजा रायसिंह, अनूप सिंह व सुजान सिंह के काल में विकसित। मुगल व दक्कनी चित्रकार बीकानेर आए; इसलिए शैली में कोमलता व बारीकी है। चित्रकार प्रायः अपने नाम व तिथि चित्र पर लिखते थे (उस्ता परिवार)।
उस्ता कला — बीकानेर की विशेष पहचान — बीकानेर की विश्वप्रसिद्ध 'उस्ता कला' = ऊँट की खाल/चमड़े पर सोने की मीनाकारी (नक्काशी व सुनहरी चित्रकारी)। यह उस्ता मुस्लिम कलाकार-परिवार से जुड़ी है। 'मुनव्वर' व 'मूरत-उस्ता' प्रसिद्ध। बीकानेर में 'उस्ता कला' संस्थान स्थित।
मारवाड़ (जोधपुर) शैली — केंद्र जोधपुर; राजा मालदेव, सूरसिंह, जसवंत सिंह व मानसिंह के काल में विकसित। पहचान — लंबे कद के पुरुष, भारी मूँछें, ऊँट-घोड़े, मरुस्थलीय परिवेश, ढोला-मारू व वीर-गाथाएँ।
मारवाड़ — रंग व विषय — पीले व लाल रंग की प्रधानता; लोक-जीवन व श्रृंगार। 'ढोला-मारू' (मरुस्थलीय प्रेम-कथा) व रागमाला प्रमुख विषय। जैसलमेर व नागौर भी इसी मारवाड़ स्कूल का हिस्सा।
याद रखें — बीकानेर की 'उस्ता कला' (ऊँट की खाल पर सोने का काम) तथा मारवाड़ की 'ढोला-मारू' व मरुस्थलीय परिवेश — ये दो पहचान CET में बार-बार पूछी जाती हैं।
बीकानेर शैली का लघुचित्र — सूअर का शिकार (केंद्रीय संग्रहालय, नागपुर)SpeakingArchaeologist · CC BY-SA 4.0 · Wikimedia Commons
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बीकानेर — मुगल/दक्कनी प्रभाव; चित्रकार नाम-तिथि लिखते (उस्ता परिवार)।
'उस्ता कला' = ऊँट की खाल पर सोने की मीनाकारी (बीकानेर की पहचान)।
मारवाड़(जोधपुर) — लंबे कद/भारी मूँछ/मरुस्थल; विषय 'ढोला-मारू'।
मारवाड़ स्कूल में जोधपुर, बीकानेर, किशनगढ़, जैसलमेर, नागौर।
7. नाथद्वारा (पिछवाई) शैली
नाथद्वारा (राजसमंद जिला) शैली मेवाड़ शैली की ही एक विशेष शाखा है, जो भगवान श्रीनाथजी (कृष्ण) की भक्ति व पुष्टिमार्गीय परंपरा से जुड़ी है। यह अपनी 'पिछवाई' चित्रकारी के लिए विश्वप्रसिद्ध है।
पिछवाई — अर्थ व विशेषता — 'पिछवाई' = श्रीनाथजी की मूर्ति के पीछे लगाया जाने वाला कपड़े का चित्र-पट (back-cloth)। इस पर श्रीनाथजी की लीलाएँ, गाय (गौ-चारण), कमल, कदम्ब वृक्ष व ऋतु-उत्सव (अन्नकूट, गोवर्धन-पूजा, होली) चित्रित होते हैं।
विषय व रंग — मुख्य विषय कृष्ण/श्रीनाथजी-लीला; गाय व कदम्ब-वृक्ष विशेष। रंग — गहरे व चटकीले; काले, हरे, नीले की प्रधानता; सोने का प्रयोग। कपड़े (वस्त्र) पर चित्रण इसकी विशेषता।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि — औरंगज़ेब के काल में श्रीनाथजी की मूर्ति मथुरा(व्रज) से लाकर 1672 में सिहाड़ गाँव (नाथद्वारा) में स्थापित की गई; तभी से नाथद्वारा चित्रकला का केंद्र बना।
चितेरों की परंपरा — नाथद्वारा के चित्रकार 'चितेरे' कहलाते हैं; ये पीढ़ी-दर-पीढ़ी पिछवाई बनाते आ रहे हैं। यह शैली आज भी जीवंत व्यावसायिक कला है।
नाथद्वारा शैली = श्रीनाथजी भक्ति + पिछवाई (कपड़े पर पीछे लगने वाला चित्र-पट)। 'पिछवाई' शब्द ही इस शैली की पहचान है — यह सीधा परीक्षा-तथ्य है।
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नाथद्वारा (राजसमंद) = मेवाड़ की शाखा; श्रीनाथजी/पुष्टिमार्ग से जुड़ी।
'पिछवाई' = श्रीनाथजी के पीछे लगने वाला कपड़े का चित्र-पट।
विषय — कृष्ण-लीला, गाय, कदम्ब; गोवर्धन-पूजा/अन्नकूट उत्सव।
श्रीनाथजी मूर्ति 1672 में सिहाड़(नाथद्वारा) स्थापित; चित्रकार 'चितेरे'।
8. अलवर, देवगढ़ व उणियारा शैली
तीन और महत्वपूर्ण उपशैलियाँ — अलवर, देवगढ़ व उणियारा। ये अपेक्षाकृत बाद की हैं पर परीक्षा में इनकी विशेष पहचान पूछी जाती है।
अलवर शैली — अलवर रियासत में विकसित; इस पर मुगल, जयपुर व कुछ यूरोपीय (अंग्रेज़ी) प्रभाव रहा। राजा विनय सिंह के काल में चरम पर। विशेषता — 'कामसूत्र' व 'गुलिस्ताँ' के चित्र; हाथी दाँत व बारीक 'बेल-बूटे' तथा हाशिया-सज्जा। बहुत महीन व सूक्ष्म चित्रण।
अलवर — विशेष तथ्य — अलवर शैली में 'बूटा-चित्रण' (हाशिये पर सोने के महीन बेल-बूटे) तथा वेश्या-नारी जीवन के सूक्ष्म चित्र प्रसिद्ध। यह राजस्थान की अपेक्षाकृत आधुनिक (19वीं सदी) शैली है।
देवगढ़ शैली — देवगढ़ (राजसमंद, उदयपुर के निकट) ठिकाने की शैली; मेवाड़, मारवाड़ व जयपुर तीनों का मिश्रण। संरक्षक रावत द्वारका दास। पहचान — पीली व हरी पृष्ठभूमि, अश्व-चित्रण (घोड़े), 'बावजी' के दरबारी दृश्य। चित्रकार — कँवला, चोखा, बैजनाथ।
उणियारा शैली — उणियारा (टोंक जिले का ठिकाना) की शैली; जयपुर व बूँदी शैलियों का मिश्रित रूप। चित्रकार 'मीर बक्श', 'काशी', 'धीमा', 'भीम' प्रसिद्ध। नायक-नायिका व कृष्ण-लीला के चित्र।
संक्षेप — अलवर (बारीक बेल-बूटे/हाथी दाँत/मुगल-यूरोपीय प्रभाव), देवगढ़ (मेवाड़+मारवाड़+जयपुर का मिश्रण/अश्व-चित्र/रावत द्वारका दास), उणियारा (जयपुर+बूँदी का मिश्रण/टोंक)। ये तीनों ठिकाना-स्तरीय उपशैलियाँ हैं।