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संधि व समास

संधि (स्वर-दीर्घ/गुण/वृद्धि/यण/अयादि · व्यंजन · विसर्ग) · समास (तत्पुरुष/कर्मधारय/द्विगु/द्वंद्व/बहुव्रीहि/अव्ययीभाव) · उपसर्ग व प्रत्यय · विच्छेद-निर्माण — संपूर्ण अध्याय
संधि (हिम + आलय = हिमालय) व समास (राजपुत्र = राजा का पुत्र)
संधि (हिम + आलय = हिमालय) व समास (राजपुत्र = राजा का पुत्र)
चित्रांकन: RealNorth

शुरू करने से पहले

संधि व समास सामान्य हिन्दी के व्याकरण भाग का सबसे अधिक प्रश्न देने वाला अध्याय है और राजस्थान CET में यहाँ से हर बार 2 से 4 प्रश्न पक्के आते हैं। 'संधि' का अर्थ है दो वर्णों (ध्वनियों) के मेल से होने वाला परिवर्तन — जैसे 'विद्या + आलय = विद्यालय'; और 'समास' का अर्थ है दो या अधिक पदों (शब्दों) के मेल से बना संक्षिप्त शब्द — जैसे 'राजा का पुत्र = राजपुत्र'। CET में प्रश्न प्रायः इन रूपों में आते हैं — दिए गए शब्द का सही संधि-विच्छेद/समास-विग्रह चुनना, संधि या समास का सही भेद पहचानना, उपसर्ग या प्रत्यय अलग करना, तथा मिलान (Match) करना। यह पृष्ठ बिल्कुल शून्य से शुरू करता है — पहले हर नियम को सरल भाषा व उदाहरण से समझाया गया है, फिर पहचान का सूत्र दिया गया है और अंत में तालिकाओं से दोहराने की व्यवस्था है। पढ़ते समय हर उदाहरण को कागज़ पर स्वयं तोड़कर/जोड़कर देखें, 'याद रखें' बिंदुओं को याद कर लें और तालिकाओं से बार-बार दोहराएँ। यही अध्याय व्याकरण के पक्के अंक दिला सकता है।

1. संधि — परिचय, प्रकार व मूल समझ

संधि (सम् + धि = मेल) का अर्थ है — दो वर्णों के परस्पर मेल से होने वाला विकार (परिवर्तन)। जब एक शब्द का अंतिम वर्ण अगले शब्द के पहले वर्ण से मिलता है तो जो ध्वनि-परिवर्तन होता है, उसे संधि कहते हैं। संधि को तोड़कर मूल शब्दों में अलग करना 'संधि-विच्छेद' कहलाता है। मेल में भाग लेने वाले वर्णों के आधार पर संधि के तीन मुख्य भेद होते हैं:

मूल बात यह है कि संधि में 'किसके साथ क्या मिल रहा है' देखना ज़रूरी है — दो स्वर मिलें तो स्वर संधि, स्वर-व्यंजन या व्यंजन-व्यंजन मिलें तो व्यंजन संधि, और विसर्ग (ः) किसी वर्ण से मिले तो विसर्ग संधि। संधि का प्रयोग संस्कृत-मूल (तत्सम) शब्दों में होता है।

याद रखें
  • संधि के तीन भेद — स्वर संधि, व्यंजन संधि, विसर्ग संधि।
  • स्वर संधि के पाँच उपभेद — दीर्घ, गुण, वृद्धि, यण, अयादि।
  • संधि = वर्णों का मेल; समास = पदों (शब्दों) का मेल — दोनों अलग हैं।
  • संधि तोड़ना = संधि-विच्छेद; जोड़ना = संधि।

2. स्वर संधि — दीर्घ व गुण संधि

स्वर संधि के पहले दो प्रमुख भेद दीर्घ और गुण संधि हैं। ये CET में सबसे अधिक पूछे जाते हैं, इसलिए इनके नियम व उदाहरण याद कर लें।

पहचान का सरल सूत्र — यदि दो एक-जैसे स्वर मिलकर लंबा (दीर्घ) स्वर बना दें तो दीर्घ संधि; और यदि अलग-अलग स्वर मिलकर 'ए/ओ/अर्' बना दें तो गुण संधि। 'देवेंद्र', 'सूर्योदय', 'महर्षि' गुण संधि के सर्वाधिक पूछे जाने वाले उदाहरण हैं।

याद रखें
  • दीर्घ — समान स्वर मिलकर दीर्घ बनें (विद्या+आलय=विद्यालय)।
  • गुण — अ/आ + इ/ई = ए; अ/आ + उ/ऊ = ओ; अ/आ + ऋ = अर्।
  • गुण के पक्के उदाहरण — देवेंद्र, सूर्योदय, महर्षि, देवर्षि।
  • महा+ऋषि=महर्षि (अ/आ+ऋ=अर्) — बार-बार पूछा जाता है।

3. स्वर संधि — वृद्धि, यण व अयादि संधि

स्वर संधि के शेष तीन भेद वृद्धि, यण और अयादि हैं। इनके नियम थोड़े कठिन लगते हैं पर उदाहरण याद करने से पहचान आसान हो जाती है।

पहचान — वृद्धि में 'ऐ/औ' बनता है (एकैक, सदैव); यण में इ/उ/ऋ बदलकर य्/व्/र् बनते हैं और आधे होकर अगले स्वर से जुड़ जाते हैं (इत्यादि, स्वागत); अयादि में ए/ऐ/ओ/औ टूटकर अय्/आय्/अव्/आव् बन जाते हैं (नयन, गायक, पवन, पावक)।

याद रखें
  • वृद्धि — अ/आ+ए/ऐ=ऐ; अ/आ+ओ/औ=औ (सदैव, एकैक, वनौषधि)।
  • यण — इ/ई→य्, उ/ऊ→व्, ऋ→र् (इत्यादि, अत्यधिक, स्वागत, अन्वय)।
  • अयादि — ए→अय्, ऐ→आय्, ओ→अव्, औ→आव् (नयन, गायक, पवन, पावक)।
  • 'स्वागत' (सु+आगत) यण संधि का सर्वाधिक पूछा उदाहरण है।

4. व्यंजन संधि — नियम व प्रमुख उदाहरण

व्यंजन संधि तब होती है जब व्यंजन के साथ व्यंजन या स्वर मिलने पर ध्वनि-परिवर्तन हो। इसके कुछ निश्चित नियम हैं जिनके उदाहरण CET में बार-बार आते हैं।

व्यंजन संधि का सबसे सरल सूचक है — दिए गए शब्द में दो व्यंजन जुड़कर नया रूप बना रहे हों, जैसे 'सज्जन' (त्+ज=ज्ज), 'उज्ज्वल' (उत्+ज्वल), 'उद्धार' (त्+ह=द्ध)। ये CET के सबसे लोकप्रिय व्यंजन-संधि उदाहरण हैं।

याद रखें
  • वर्ग का पहला वर्ण → तीसरा वर्ण — दिक्+अंत=दिगंत; जगत्+ईश=जगदीश; अप्+ज=अब्ज।
  • त्+ज=सज्जन; त्+च=सच्चरित्र; त्+ह=उद्धार; त्+श=उच्छ्वास।
  • न→ण — परिणाम, प्रमाण, रामायण (र/ष/ऋ के प्रभाव से)।
  • सम्+तोष=संतोष; सम्+गम=संगम (म्+व्यंजन=अनुस्वार)।

5. विसर्ग संधि — नियम व प्रमुख उदाहरण

विसर्ग (ः) के साथ किसी स्वर या व्यंजन के मेल से होने वाले परिवर्तन को विसर्ग संधि कहते हैं। इसमें 'निः', 'दुः', 'मनः', 'अंतः' जैसे उपसर्ग/शब्द सबसे अधिक पूछे जाते हैं।

विसर्ग संधि का सबसे सरल पहचान-सूत्र — शब्द के आरंभ में 'निः, दुः, मनः, तपः, अंतः, प्रातः' जैसे रूप हों। 'निराहार', 'निर्जल', 'निश्चल', 'मनोरथ', 'दुरात्मा' इसके सर्वाधिक पूछे जाने वाले उदाहरण हैं।

याद रखें
  • अः → ओ — मनः+रथ=मनोरथ; तपः+वन=तपोवन; अधः+गति=अधोगति।
  • इः/उः → र् — निः+आहार=निराहार; निः+जल=निर्जल; दुः+आत्मा=दुरात्मा।
  • इः/उः → श्/ष् — निः+चल=निश्चल; निः+कलंक=निष्कलंक; निः+फल=निष्फल।
  • अतः+एव=अतएव (विसर्ग लोप); नमः+ते=नमस्ते (विसर्ग→स्)।

6. समास — परिचय, विग्रह व छह भेद

समास (सम् + आस = संक्षेप) का अर्थ है — दो या अधिक पदों के मेल से बना एक संक्षिप्त शब्द, जिसमें बीच के कारक-चिह्न (का, के, में, से, और आदि) लुप्त हो जाते हैं। जैसे — 'राजा का पुत्र' का संक्षिप्त रूप 'राजपुत्र'। समास को तोड़कर मूल पदों में लिखना 'समास-विग्रह' कहलाता है। समास में दो पद होते हैं — पहला 'पूर्वपद' व दूसरा 'उत्तरपद'। किस पद की प्रधानता है, इसी आधार पर समास के छह भेद होते हैं:

पहचान का मूल सूत्र — कौन-सा पद प्रधान है यही समास का भेद तय करता है: उत्तरपद प्रधान → तत्पुरुष/कर्मधारय/द्विगु; दोनों प्रधान → द्वंद्व; दोनों गौण व तीसरा अर्थ → बहुव्रीहि; पूर्वपद अव्यय → अव्ययीभाव।

याद रखें
  • समास के छह भेद — तत्पुरुष, कर्मधारय, द्विगु, द्वंद्व, बहुव्रीहि, अव्ययीभाव।
  • उत्तरपद प्रधान → तत्पुरुष; दोनों प्रधान → द्वंद्व; पूर्वपद अव्यय → अव्ययीभाव।
  • बहुव्रीहि में समस्त पद किसी तीसरे (अन्य) का अर्थ देता है — दशानन=रावण।
  • समास तोड़ना = समास-विग्रह; पूर्वपद + उत्तरपद।

7. तत्पुरुष व उसके उपभेद; कर्मधारय व द्विगु की पहचान

तत्पुरुष समास में बीच का कारक-चिह्न लुप्त होता है और उत्तरपद प्रधान रहता है। लुप्त कारक के आधार पर तत्पुरुष के छह उपभेद होते हैं (कर्ता को छोड़कर शेष कारक):

कर्मधारय और द्विगु दोनों तत्पुरुष के ही उपभेद माने जाते हैं। अंतर इतना है — कर्मधारय में पहला पद विशेषण होता है (नीला कमल→नीलकमल) जबकि द्विगु में पहला पद संख्या होती है (तीन भुज→त्रिभुज)। 'नञ् तत्पुरुष' में निषेधवाचक उपसर्ग 'अ/अन्' लगता है — जैसे असत्य, अनादि, अधर्म।

याद रखें
  • तत्पुरुष में लुप्त कारक के आधार पर भेद — कर्म, करण, संप्रदान, अपादान, संबंध, अधिकरण।
  • कर्मधारय — पहला पद विशेषण (नीलकमल, महापुरुष, चंद्रमुख)।
  • द्विगु — पहला पद संख्यावाचक व समूहबोधक (त्रिभुज, पंचवटी, नवरात्र, चौराहा)।
  • नञ् तत्पुरुष — निषेधक अ/अन् (असत्य, अनादि, अधर्म)।

8. द्वंद्व, बहुव्रीहि व अव्ययीभाव की पक्की पहचान

ये तीन समास CET में मिलान व पहचान के लिए सर्वाधिक पूछे जाते हैं। इनकी पहचान का अलग-अलग पक्का सूत्र याद रखें:

मुख्य सूत्र — द्वंद्व में 'और' लगाकर विग्रह बने; अव्ययीभाव में पहला पद उपसर्ग/अव्यय हो (प्रति, यथा, आ, भर, बे); और बहुव्रीहि में समस्त पद किसी तीसरे का नाम/गुण बता दे। बहुव्रीहि के उदाहरण प्रायः देवताओं के नाम (शिव, विष्णु, गणेश, रावण) होते हैं।

याद रखें
  • द्वंद्व — 'और/या' से विग्रह (माता-पिता, सुख-दुख, नर-नारी)।
  • बहुव्रीहि — समस्त पद तीसरे का बोध (दशानन=रावण, पीतांबर=कृष्ण, त्रिनेत्र=शिव)।
  • अव्ययीभाव — पूर्वपद उपसर्ग/अव्यय (प्रतिदिन, यथाशक्ति, आजीवन, भरपेट)।
  • एक ही शब्द कर्मधारय या बहुव्रीहि — अर्थ से भेद तय (नीलकंठ)।

9. उपसर्ग व प्रत्यय — अर्थ-परिवर्तक अंश

उपसर्ग (उप+सर्ग = समीप जुड़ना) वे शब्दांश हैं जो किसी शब्द के आरंभ में जुड़कर उसका अर्थ बदल देते हैं या नया अर्थ देते हैं — जैसे 'हार' से प्र+हार=प्रहार, सम्+हार=संहार, आ+हार=आहार, वि+हार=विहार। इसके विपरीत प्रत्यय शब्द के अंत में जुड़ते हैं — जैसे 'पढ़' से पढ़ाई, पढ़ाकू। प्रत्यय दो प्रकार के होते हैं:

उपसर्ग व प्रत्यय की पहचान का सरल सूत्र — शब्द के 'आगे' जुड़े अर्थ-बदलने वाले अंश उपसर्ग, और 'पीछे' जुड़े अंश प्रत्यय कहलाते हैं। कुल मिलाकर एक ही मूल शब्द में आगे-पीछे दोनों जुड़ सकते हैं — जैसे 'प्र+हार+ई' आदि। CET में 'दिए गए शब्द में उपसर्ग/प्रत्यय छाँटिए' सीधे पूछा जाता है।

याद रखें
  • संस्कृत के 22 प्रमुख उपसर्ग — प्र, परा, अप, सम्, अनु, अव, निस्, निर्, दुस्, दुर्, वि, आ, नि, अधि, अपि, अति, सु, उत्, अभि, प्रति, परि, उप।
  • प्रत्यय दो — कृत् (धातु से: लिखावट, पढ़ाई) व तद्धित (संज्ञा से: मानवता, बुढ़ापा)।
  • उर्दू/फारसी उपसर्ग — बे, ला, गैर, हम, बद, खुश, ना।
  • उपसर्ग आगे जुड़ता है, प्रत्यय पीछे — अर्थ बदल देता है।

संधि-समास — झलकियाँ

परीक्षा-उपयोगी तालिकाएँ

स्वर संधि — पाँच भेद, नियम व उदाहरण

भेदनियम व उदाहरण
दीर्घसमान स्वर मिलें = दीर्घ; विद्या+आलय=विद्यालय, मुनि+इंद्र=मुनींद्र
गुणअ/आ + इ/उ/ऋ = ए/ओ/अर्; देव+इंद्र=देवेंद्र, सूर्य+उदय=सूर्योदय, महा+ऋषि=महर्षि
वृद्धिअ/आ + ए-ऐ/ओ-औ = ऐ/औ; एक+एक=एकैक, सदा+एव=सदैव, वन+औषधि=वनौषधि
यणइ/उ/ऋ + भिन्न स्वर = य्/व्/र्; इति+आदि=इत्यादि, सु+आगत=स्वागत
अयादिए/ऐ/ओ/औ + स्वर = अय्/आय्/अव्/आव्; ने+अन=नयन, पो+अन=पवन

व्यंजन व विसर्ग संधि — प्रमुख विच्छेद

शब्दविच्छेद व भेद
सज्जनसत् + जन (व्यंजन संधि — त्+ज=ज्ज)
उद्धारउत् + हार (व्यंजन संधि — त्+ह=द्ध)
जगदीशजगत् + ईश (व्यंजन संधि — त्→द्)
मनोरथमनः + रथ (विसर्ग संधि — अः→ओ)
निराहारनिः + आहार (विसर्ग संधि — इः→र्)
निश्चलनिः + चल (विसर्ग संधि — इः→श्)

समास के छह भेद — पहचान व उदाहरण

समासप्रधानता / पहचान व उदाहरण
तत्पुरुषउत्तरपद प्रधान; राजपुत्र (राजा का पुत्र), गंगाजल
कर्मधारयपहला पद विशेषण; नीलकमल, महापुरुष, चंद्रमुख
द्विगुपहला पद संख्या (समूह); त्रिभुज, नवरात्र, चौराहा, पंचवटी
द्वंद्वदोनों प्रधान ('और'); माता-पिता, सुख-दुख, नर-नारी
बहुव्रीहितीसरे का बोध; दशानन=रावण, लंबोदर=गणेश, पीतांबर=कृष्ण
अव्ययीभावपूर्वपद अव्यय/उपसर्ग; प्रतिदिन, यथाशक्ति, आजीवन, भरपेट

समास-विग्रह — पक्के उदाहरण

समस्त पदविग्रह व भेद
नीलकमलनीला है जो कमल (कर्मधारय)
त्रिलोकतीन लोकों का समूह (द्विगु)
दिन-रातदिन और रात (द्वंद्व)
चतुराननचार हैं आनन जिसके=ब्रह्मा (बहुव्रीहि)
यथाशक्तिशक्ति के अनुसार (अव्ययीभाव)
देशभक्तिदेश के लिए भक्ति (तत्पुरुष)

उपसर्ग व प्रत्यय — पहचान

अंशस्थान व उदाहरण
उपसर्ग (संस्कृत)शब्द के आगे; प्र+हार=प्रहार, सम्+हार=संहार, वि+हार=विहार
उपसर्ग (उर्दू)बे+काम=बेकाम, ला+जवाब=लाजवाब, गैर+हाजिर=गैरहाजिर
कृत् प्रत्ययधातु के अंत में; लिख+आवट=लिखावट, पढ़+आई=पढ़ाई, लड़+आकू=लड़ाकू
तद्धित प्रत्ययसंज्ञा/विशेषण के अंत में; मानव+ता=मानवता, बूढ़ा+पा=बुढ़ापा

बहुव्रीहि समास — देवताओं/व्यक्तियों के पर्याय

समस्त पदअर्थ (कौन)
दशानन / दशकंठरावण (दस मुख वाला)
लंबोदर / गजाननगणेश
त्रिनेत्र / नीलकंठशिव
पीतांबर / चक्रधरकृष्ण/विष्णु
चतुराननब्रह्मा (चार मुख)
वीणापाणिसरस्वती (हाथ में वीणा)

शब्दावली — अंग्रेज़ी पद का अर्थ

संधि
दो वर्णों (ध्वनियों) के मेल से होने वाला परिवर्तन; जैसे विद्या+आलय=विद्यालय।
संधि-विच्छेद
संधि से बने शब्द को तोड़कर मूल वर्णों/शब्दों में अलग करना।
स्वर संधि
दो स्वरों के मेल से बनी संधि; इसके पाँच भेद — दीर्घ, गुण, वृद्धि, यण, अयादि।
व्यंजन संधि
व्यंजन के साथ व्यंजन/स्वर के मेल से बनी संधि; जैसे सत्+जन=सज्जन।
विसर्ग संधि
विसर्ग (ः) के साथ स्वर/व्यंजन के मेल से बनी संधि; जैसे निः+आहार=निराहार।
समास
दो या अधिक पदों के मेल से बना संक्षिप्त शब्द; जैसे राजा का पुत्र=राजपुत्र।
समास-विग्रह
समस्त पद को तोड़कर मूल पदों में अलग करना (विग्रह)।
पूर्वपद / उत्तरपद
समास का पहला पद = पूर्वपद; दूसरा पद = उत्तरपद।
बहुव्रीहि
वह समास जिसका समस्त पद किसी तीसरे (अन्य) का बोध कराए; जैसे दशानन=रावण।
अव्ययीभाव
वह समास जिसका पूर्वपद अव्यय/उपसर्ग हो व पूरा पद अव्यय बने; जैसे प्रतिदिन।
उपसर्ग
शब्द के आरंभ में जुड़कर अर्थ बदलने वाला शब्दांश; जैसे प्र+हार=प्रहार।
प्रत्यय
शब्द के अंत में जुड़ने वाला अंश; कृत् (धातु से) व तद्धित (संज्ञा से) दो प्रकार।
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